लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी में मानसून की चाल क्या बदली, व्यवस्था के तमाम दावों और नारों का बांध पहली ही बारिश में बह गया। जलभराव की तस्वीरें अमूमन आम गलियों और बस्तियों से आती थीं, लेकिन इस बार पानी ने सीधे प्रशासन के श्कंट्रोल रूमश् पर ही दस्तक दे दी है।
गोमती नदी के बढ़ते जलस्तर और शहर की ड्रेनेज व्यवस्था के ध्वस्त होने का सबसे दिलचस्प नमूना विभूति खंडध्गोमती नगर इलाके में देखने को मिला। श्उत्तर प्रदेश राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरणश् (न्च्ैक्ड।)कृजिस एजेंसी के कंधों पर पूरे प्रदेश को कुदरती और मानव-निर्मित आपदाओं से बचाने का जिम्मा हैकृउसकी अपनी ही इमारत चारों तरफ से लबालब पानी में घिरी नजर आई। दफ्तर तक जाने वाली मुख्य सड़क और एप्रोच रोड पर इतना जलजमाव हो गया कि कर्मचारियों और अफसरों को दफ्तर में दाखिल होने के लिए भी आपदा प्रबंधन के ही पैंतरे आजमाने पड़े।
पानी की इस बेदर्द मार से कोई वीआईपी इलाका अछूता नहीं रहा। शहर के सबसे पॉश और आधुनिक ठिकानों में शुमार श्फीनिक्स प्लासियो मॉलश् के मुख्य गेट पर घुटनों तक भरे पानी ने स्मार्ट सिटी के दावों का पूरा कचरा कर दिया। मॉल आने-जाने वाले खरीदार और गाड़ियां पानी के बीच ही हिचकोले खाती दिखीं।
यह स्थिति महज जलभराव की नहीं, बल्कि प्रशासनिक लाचारगी और दूरदर्शिता की भारी कमी का प्रतीक है। जिस तंत्र का मुख्य काम ही जलभराव, बाढ़ और आपदा जैसी स्थितियों से जनता को सुरक्षा देना है, अगर वह अपने खुद के दफ्तर की सड़क को जलमग्न होने से नहीं रोक सकता, तो वह लाखों की आबादी वाले इस शहर को किसी बड़ी त्रासदी में कैसे संभालेगा?
हर साल मानसून से पहले करोड़ों रुपये के नालों की सफाई, ड्रेनेज प्लान और स्मार्ट ड्रेनेज सिस्टम के कागज काले किए जाते हैं। लेकिन जैसे ही पहली-दूसरी तेज बारिश होती है, ये सारे बजट और कागजी दावे गोमती के गंदे पानी में बहते हुए साफ दिखाई देते हैं। जनता अब सवाल पूछ रही है कि आखिर इन कागजी श्रक्षकोंश् का जवाबदेही से सामना कब होगा?।
