लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में धर्म, संस्कृति और जनसंपर्क का संबंध हमेशा से गहरा रहा है, लेकिन आगामी चुनावों से पहले भारतीय जनता पार्टी के दिग्गजों और प्रभावशाली क्षत्रपों द्वारा भव्य कथा आयोजनों की बाढ़ ने प्रदेश के सियासी माहौल को पूरी तरह से गरमा दिया है। रायबरेली में ऊंचाहार विधायक व कैबिनेट मंत्री दर्जा प्राप्त मनोज पांडेय द्वारा आयोजित श्श्री शिवमहापुराण कथाश् में जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा, दोनों उप-मुख्यमंत्री (केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक) तथा प्रदेश भाजपा अध्यक्ष भूपेंद्र चैधरी की मौजूदगी ने इस धार्मिक आयोजन को विशुद्ध रूप से एक बड़ा राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन बना दिया है। साथ ही प्रदेश के विभिन्न क्षेत्र के विधायकों एवं सांसदों का श्री शिव महापुराण कथा मे पहुंच कर आशीर्वाद लेना निश्चित ही प्रदेश की जनता को आगामी विधानसभा चुनाव मे धर्म के साथ सफल संवाद स्थापित करना है। यही उपयुक्त समय है बीजेपी के लिए जब हिंदुत्व कार्ड और श्सॉफ्ट ब्रांडिंगश् का अचूक मिश्रण जनता को दिया सकता है।
इसके साथ ही पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह द्वारा रितेश्वर महाराज की कथा कराना और कुंडा से विधायक रघुराज प्रताप सिंह श्राजा भैयाश् द्वारा पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की कथा के आयोजन की तैयारी यह साबित करती है कि यूपी के दिग्गज नेताओं ने जनसंपर्क का एक नया और असरदार तरीका खोज लिया है।
बीजेपी यह जानती है कि राजनीतिक रैलियों और सभाओं में अब जनता की सहज भागीदारी कम हो रही है। भाषण सुनने के बजाय लोग दूरी बना रहे हैं। ऐसे में लोकप्रिय सेलिब्रिटी कथावाचकों (जैसे पं. धीरेंद्र शास्त्री या पं. प्रदीप मिश्रा) के जरिए एक ही स्थान पर लाखों की भीड़ बिना किसी अतिरिक्त राजनीतिक दबाव के स्वतः जुट जाती है। नेताओं को एक बनी-बनाई श्कैप्टिव ऑडियंसश् (सांस्कृतिक रूप से एकजुट भीड़) मिल जाती है, जहाँ से वे अपना संदेश आसानी से दे सकते हैं।
भारतीय जनता पार्टी घर-घर जाकर वोट मांगने या राजनीतिक बयानबाजी करने से ज्यादा असरदार खुद को धर्म-रक्षक और जन-सेवक के रूप में पेश करना है। जब कोई नेता शिवपुराण या रामकथा का आयोजन कराता है, तो उसकी छवि एक सांस्कृतिक व धार्मिक जननायक की बनती है। इससे बिना कोई आक्रामक भाषण दिए बहुसंख्यक वोट बैंक का ध्रुवीकरण और उनके साथ भावनात्मक जुड़ाव स्वतः हो जाता है।
बीजेपी दलीय सीमाओं से परे श्ब्राह्मण व ठाकुरश् क्षत्रपों का शक्ति प्रदर्शन भी चुनाव के ठीक पहले दिखना चाहती है। मनोज पांडेय, बृजभूषण शरण सिंह और राजा भैया जैसे नेताओं का जनाधार केवल पार्टी सिंबल तक सीमित नहीं हैय वे अपने-अपने क्षेत्रों में बड़े जातीय व क्षेत्रीय क्षत्रप हैं। मनोज पांडेय का सपा छोड़कर भाजपा खेमे में आने के बाद से लगातार श्बटुक सम्मानश् से लेकर भव्य कथा कराना, भाजपा के भीतर अपनी उपयोगिता और ब्राह्मण वोट बैंक पर अपनी पकड़ साबित करने की कवायद है। वहीं, राजा भैया और बृजभूषण सिंह जैसे नेता अपनी स्वतंत्र सियासी प्रासंगिकता को और मजबूत कर रहे हैं।
रायबरेली कथा में सरकार के दो-दो उप-मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष का पहुँचना यह दर्शाता है कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व भी इस श्कथा मॉडलश् को आगामी चुनावों के दृष्टिकोण से बेहद उपयोगी मान रहा है। रायबरेली और अवध क्षेत्र की अन्य सीटों पर जहाँ भाजपा को अपनी पकड़ और मजबूत करनी है, वहाँ ऐसे आयोजनों से पार्टी को जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाने और जनता से सीधा संपर्क साधने का सहज अवसर मिल जाता है।
उत्तर प्रदेश में चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं, नेताओं ने श्जनता की नब्जश् को पूरी तरह भांप लिया है। चुनावी समर में जनसभाओं और रैलियों की जगह अब व्यासपीठ और शिवपुराण ने ले ली है। यह श्धर्म के जरिए राजनीतिश् और श्राजनीति के जरिए धर्मश् का ऐसा नया मिश्रण है, जो आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनावों में मतों के समीकरण तय करने में बेहद निर्णायक भूमिका निभाएगा।
