लखनऊ। राजधानी का प्रसिद्ध लोकबंधु चैराहा इन दिनों विकास की एक ऐसी नई परिभाषा लिख रहा है, जिसे समझने के लिए रोशनी की नहीं, बल्कि भारी-भरकम श्चश्मेश् की जरूरत है। पिछले 10 दिनों से चैराहे की स्ट्रीट लाइटें पूरी तरह ठप हैं और पूरा इलाका शाम ढलते ही श्अँधेर नगरीश् में तब्दील हो जाता है।
तंज की बात यह है कि इस चैराहे का भाग्य इतना श्चमकदारश् है कि इसके खाते में एक-दो नहीं, बल्कि पूरे तीन-तीन पार्षद आते हैंकृकमलेश सिंह जी, कौशलेन्द्र द्विवेदी जी और सौरभ सिंह श्मोनूश् जी। ये तीनों ही माननीय अपने क्षेत्रों में भारी-भरकम बजट लाने और विकास की नई इबारत लिखने के लिए जाने जाते हैं। लेकिन अफसोस, लोकबंधु चैराहे पर आकर इन तीनों ही दिग्गजों के विकास का श्फ्यूजश् उड़ जाता है।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि तीन पार्षदों का होना चैराहे के लिए वरदान नहीं, बल्कि ऐसा श्राप बन गया है जैसे ष्ज्यादा रसोइये खाना खराब कर देते हैं।ष्
जब किसी एक पार्षद से शिकायत करो, तो शायद दूसरे के पाले में गेंद डाल दी जाती है और तीसरे पार्षद का इंतजार होता है। नतीजतन, तीनों दिग्गजों के रहते हुए भी जनता 10 दिनों से सड़क पर ठोकरें खाने को मजबूर है। क्षेत्र में करोड़ों के बजट का दावा करने वाले इन विकास पुरुषों की कार्यशैली देखिए कि 10 दिन से बंद पड़ी स्ट्रीट लाइटों के लिए एक साधारण सा बल्ब या फ्यूज बदलने का बजट शायद श्स्वीकृतश् ही नहीं हो पा रहा है। लखनऊ को स्मार्ट सिटी बनाने के बड़े-बड़े दावों के बीच लोकबंधु चैराहा यह साबित कर रहा है कि श्दीये तले ही सबसे ज्यादा अंधेराश् होता है।
क्षेत्रीय जनता अब चुटकी ले रही है कि अगर यही स्थिति रही, तो जल्द ही चैराहे पर टॉर्च लेकर चलने का नया श्स्मार्ट नियमश् लागू करना पड़ेगा। बेहतर होगा कि तीनों लोकप्रिय जनप्रतिनिधि आपसी श्सद्भावश् और अपने विशालकाय बजट से लोकबंधु चैराहे को भी थोड़ा-सा रोशन कर दें, ताकि जनता को यह अहसास हो सके कि तीन पार्षदों का होना वाकई फायदे का सौदा है, महज कागजी दावों का नहीं।
