लखनऊ। ष्लाखों-करोड़ों रुपये जमा कीजिए और बदले में बीमारियों का मुफ्त हब पाइए!ष्कृलखनऊ विकास प्राधिकरण की जानकीपुरम योजना आजकल इसी अनोखे श्ऑफरश् के लिए शहर में चर्चा का विषय बनी हुई है। जानकीपुरम के सेक्टर-ई और आसपास के इलाकों में बदहाली इस कदर हावी है कि एलडीए के बड़े-बड़े दावों की हवा निकल चुकी है। जलभराव और उफनते सीवर के बीच सांस लेने को मजबूर स्थानीय नागरिक अब खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
क्षेत्रीय लोगों ने खून-पसीने की गाढ़ी कमाई से एलडीए के महंगे भूखंड इस उम्मीद में खरीदे थे कि उन्हें एक विश्वस्तरीय आवासीय सुविधा मिलेगी। लेकिन हकीकत यह है कि आज यह पूरा इलाका सड़ांध मारते बदबूदार पानी, बजबजाते सीवर और जगह-जगह लगे कूड़े के ढेरों में तब्दील हो चुका है। डेंगू और मलेरिया के पनपते मच्छरों के बीच रह रहे निवासियों का कहना है कि एलडीए ने उन्हें श्सपनों का आशियानाश् नहीं, बल्कि श्बीमारियों का हबश् बेचा है।
प्राधिकरण के लचर रवैये पर सवाल उठाते हुए अब जनता की नाराजगी चरम पर पहुंच चुकी है। लोगों का सीधा कहना है कि एलडीए के माननीय उपाध्यक्ष साहब को अपने प्रभारी जोनल अभियंताओं की क्लास एसी कमरों के ठंडे माहौल में बैठाकर नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत दिखाने के लिए फील्ड में लाकर लगानी चाहिए। जब तक ये अफसर सड़कों की धूल और सीवर की बदबू खुद महसूस नहीं करेंगे, तब तक कागजों पर श्बीमारी परियोजनाओं पर यूँ ही मुहर लगती रहेगी।
हैरानी की बात तो यह है कि इस बदहाली पर नगर निगम, जलकल, स्वास्थ्य विभाग और क्षेत्र के जनप्रतिनिधि पूरी तरह मौन साधे बैठे हैं। ऐसा लगता है जैसे अधिकारियों और नेताओं को जनता की इस बेबसी से कोई सरोकार ही नहीं रह गया है। महकमों की पूरी फुर्ती सिर्फ समाचार पत्रों की सुर्खियों और फोटो सेक्शन में चमकने तक ही सीमित होकर रह गई है।
तस्वीरों में चमचमाते विकास के दावों के बीच जानकीपुरम की त्रस्त जनता आज मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रही है। अब देखना यह होगा कि खबरों में खिंचने वाली इन तस्वीरों से इतर क्या कोई जिम्मेदार अधिकारी जमीनी जलभराव और उफनते सीवर का पक्का इलाज खोज पाएगा, या जानकीपुरम की जनता यूँ ही सिस्टम की लापरवाही का दंश झेलती रहेगी।
