लखनऊ। उत्तर प्रदेश की सियासत में श्चुप्पीश् अक्सर बड़े सियासी तूफानों की आहट होती है, लेकिन जब कोई कद्दावर नेता खुलकर अपनी ही पार्टी के खिलाफ दर्द बयां करने लगे, तो समझ लीजिए कि खिचड़ी कुछ गहरी पक रही है। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में केंद्रीय राज्य मंत्री रहे और बीजेपी के पूर्व सांसद कौशल किशोर के हालिया तेवरों ने लखनऊ से लेकर दिल्ली तक के राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है।
अपनी ही पार्टी के अंदर उपेक्षा, कार्यक्रमों में न बुलाए जाने की कसक और 2024 के लोकसभा चुनाव में श्भीतरी भितरघातश् का आरोप लगाकर कौशल किशोर ने एक तरह से बगावत का बिगुल फूंक दिया है। सोशल मीडिया पर उनके हालिया पोस्टकृष्गेंद ऊपर जाकर अब नीचे आ रही हैष् और ष्उसूलों से नहीं भटकना चाहिएष्कृमहज शायरी या सामान्य विचार नहीं हैं, बल्कि इन्हें सीधे तौर पर बीजेपी नेतृत्व को दिया गया कड़ा राजनीतिक संकेत माना जा रहा है।
सियासी चालों में माहिर कौशल किशोर ने हालांकि अभी पार्टी छोड़ने या समाजवादी पार्टी का दामन थामने का सीधा ऐलान नहीं किया है। उन्होंने यह साफ किया है कि वे फिलहाल भारतीय जनता पार्टी के साथ हैं और संगठन की मूल विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध हैं। लेकिन राजनीति के जानकारों का मानना है कि श्घर में रहकर लड़ाईश् लड़ने का यह अंदाज पार्टी हाईकमान पर दबाव बनाने की एक सोची-समझी रणनीति है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति से जुड़े बड़े सुलगते सवाल उठ रहे है। बीजेपी के भीतर पिछड़ रहे अपने राजनीतिक आधार को बचाने के लिए कौशल किशोर का यह श्आक्रामक रुखश् कितना कारगर होगा? अगर हाईकमान ने समय रहते उनकी नाराजगी दूर नहीं की, तो यह अंदरूनी खींचतान पार्टी के दलित वोट बैंक को नुकसान पहुंचा सकती है। समाजवादी पार्टी लगातार दलित और पिछड़े वर्ग के कद्दावर चेहरों को अपने पाले में लाने की ताक में है। कौशल किशोर की लखनऊ और आसपास के पासी समाज में मजबूत पकड़ है। अगर सपा उन्हें अपने साथ जोड़ने में कामयाब होती है, तो यह अखिलेश यादव के श्च्क्।श् (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के लिए बड़ी कामयाबी होगी। अवध क्षेत्र की कई विधानसभा सीटों पर कौशल किशोर का अपना व्यक्तिगत प्रभाव माना जाता है। यदि 2027 के महासमर से पहले वे पाला बदलते हैं या निष्क्रिय भी होते हैं, तो मोहनलालगंज समेत आसपास के जिलों का सियासी गणित पूरी तरह बिगड़ सकता है।
फिलहाल श्गेंदश् बीजेपी के पाले में है। देखना यह होगा कि पार्टी नेतृत्व अपने पूर्व केंद्रीय मंत्री को साधने के लिए मनावन का रास्ता अपनाता है या फिर यह राजनीतिक खींचतान 2027 से पहले किसी बड़े सियासी धमाके का सबब बनती है।
