लखनऊ। नगर निगम का प्रशासनिक गलियारा इन दिनों नियमों की नहीं, बल्कि श्खास सुरोंश् की धुन पर थिरकता दिख रहा है। कायदे-कानून की पोथियां किनारे धर दी गई हैं और श्पिक एंड चूजश् का ऐसा अनोखा खेल जारी है, जिसे देखकर खुद चाणक्य भी अपना माथा पीट लें। सवाल सीधा है कि जब तबादलों की सूची एक साथ निकली थी, तो रिलीविंग की गाज सिर्फ एक ही गर्दन पर क्यों गिरी?
कहते हैं कि जब श्बड़े साहबश् अपनी तान छेड़ते हैं, तो बड़े से बड़े साहबों का रुख बदल जाता है। इसी श्सुरमयी इच्छाश् का कमाल है कि सफाई निरीक्षक देवेंद्र वर्मा की विदाई वाली फाइल ने तो जैसे रॉकेट के पंख लगा लिए। रातों-रात आदेश जारी हुआ और वर्मा जी को तत्काल कार्यमुक्त कर दिया गया। लेकिन बाकी अधिकारियों और कर्मचारियों के तबादला आदेश आते ही अफसरों की कलम की स्याही अचानक सूख कैसे गई ? क्या कार्यकारी साहब पर श्डबल पावरश् का खुमार छाया था या फिर किसी अदृश्य हाथ का भारी दबाव, जिसने सिर्फ एक ही नाम पर लाल स्याही चलाने पर मजबूर कर दिया?
नियमों का दोहरा मापदंड देखना हो तो जोन 8 का रुख कीजिए, जहां मोहम्मद नईम जैसे साहबान सालों से कुर्सी पर अंगद का पांव जमाए बैठे हैं। उनका तबादला लेटर तो आता है, लेकिन वह महज रद्दी का टुकड़ा बनकर फाइलों के नीचे दब जाता है। इंजीनियरिंग और जलकल विभाग के अधिकारियों-कर्मचारियों से लेकर अपर नगर आयुक्त तक के ट्रांसफर हो गए, पर उन्हें श्प्रशासनिक जरूरतश् का कवच पहनाकर रोक लिया गया। सवाल अब अपर नगर आयुक्त पंकज श्रीवास्तव की कार्यप्रणाली पर भी उठता है कि देवेंद्र वर्मा के मामले में प्रशासनिक तेजी दिखाने वाली कलम, बाकी चेहरों पर आकर अचानक लाचार और पंगु क्यों हो जाती है ?
नगर निगम में तबादला प्रक्रिया अब जनसेवा का माध्यम न होकर महज एक औपचारिक खानापूर्ति बनकर रह गई है। अगर नियम सबके लिए एक हैं, तो कार्रवाई के दो पैमाने क्यों? क्या नगर निगम अब किसी की निजी पसंद-नापसंद और श्सुरमयी तानोंश् से चलेगा? जब तक इन सुलगते सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक निगम के गलियारों में यही गूंज सुनाई देती रहेगी कि ट्रांसफर तो सबका हुआ, लेकिन विदाई का नियम सिर्फ एक के ही हिस्से आया!
