गन्ने के खेत से रसोई तकरू आखिर क्यों महंगी हो रही है चीनी, एथेनॉल नीति का कितना है प्रभाव और आम जनता पर क्या पड़ेगा असर?
रूद्रपुर। भारत विश्व के सबसे बड़े चीनी उत्पादक और उपभोक्ता देशों में शामिल है। देश के करोड़ों किसानों की आजीविका गन्ने की खेती पर निर्भर करती है, जबकि चीनी करोड़ों परिवारों की दैनिक आवश्यकता का हिस्सा है। सुबह की चाय से लेकर मिठाइयों, बेकरी उत्पादों, शीतल पेय, आइसक्रीम और खाद्य उद्योग तक चीनी की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसलिए जब चीनी की कीमतों में वृद्धि होती है, तो उसका प्रभाव केवल बाजार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आम नागरिकों के घरेलू बजट, उद्योगों की लागत, किसानों की आय और देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है।
पिछले कुछ वर्षों में चीनी की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। कभी मौसम की मार, कभी उत्पादन में कमी, कभी अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियां और कभी एथेनॉल नीति को इसकी वजह बताया जाता है। ऐसे में यह समझना आवश्यक है कि आखिर चीनी के दाम क्यों बढ़ते हैं और इसका आम जनता पर क्या प्रभाव पड़ता है।
चीनी की कीमतों में वृद्धि का सबसे बड़ा कारण गन्ने के उत्पादन में कमी माना जाता है। भारत में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और बिहार प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्य हैं। यदि इन राज्यों में वर्षा सामान्य से कम हो, सूखा पड़े, बाढ़ आ जाए या जलवायु परिवर्तन के कारण फसल प्रभावित हो जाए, तो चीनी उत्पादन पर सीधा असर पड़ता है।
विशेषज्ञों के अनुसार जलवायु परिवर्तन अब कृषि के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। समय पर बारिश न होना, अत्यधिक तापमान और सिंचाई की समस्या के कारण गन्ने की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों प्रभावित होते हैं। जब उत्पादन कम होता है और मांग बनी रहती है, तो स्वाभाविक रूप से कीमतें बढ़ने लगती हैं।
भारत त्योहारों का देश है। रक्षाबंधन, जन्माष्टमी, गणेशोत्सव, नवरात्र, दशहरा, दीपावली, ईद, क्रिसमस और विवाह सीजन के दौरान मिठाइयों और खाद्य उत्पादों की मांग कई गुना बढ़ जाती है। इन अवसरों पर चीनी की खपत अचानक बढ़ जाती है।
मिठाई बनाने वाले, बेकरी उद्योग, होटल और पेय पदार्थ निर्माता बड़ी मात्रा में चीनी खरीदते हैं। यदि उसी समय उत्पादन कम हो, तो बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ जाती हैं। यही कारण है कि त्योहारी मौसम में चीनी के दाम अक्सर बढ़ते हुए दिखाई देते हैं।
जब बाजार में यह आशंका होती है कि आने वाले समय में चीनी महंगी हो सकती है, तब कुछ व्यापारी बड़ी मात्रा में चीनी का भंडारण कर लेते हैं। इससे बाजार में कृत्रिम कमी उत्पन्न होती है और खुदरा कीमतें बढ़ जाती हैं।
सरकार समय-समय पर जमाखोरी रोकने के लिए स्टॉक सीमा निर्धारित करती है और निगरानी बढ़ाती है, लेकिन कई बार मांग और आपूर्ति के असंतुलन के कारण कीमतों पर नियंत्रण करना कठिन हो जाता है।
आज भारत की अर्थव्यवस्था वैश्विक बाजार से जुड़ी हुई है। ब्राजील, थाईलैंड और अन्य प्रमुख चीनी उत्पादक देशों में उत्पादन घटने या निर्यात नीति में बदलाव का प्रभाव अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर पड़ता है। यदि विश्व बाजार में चीनी महंगी होती है, तो उसका असर भारतीय बाजार पर भी दिखाई देता है।
इसके अलावा कच्चे तेल की कीमतों में बदलाव, परिवहन लागत और अंतरराष्ट्रीय व्यापार की परिस्थितियां भी चीनी के दामों को प्रभावित करती हैं।
हाल के वर्षों में एथेनॉल का विषय सबसे अधिक चर्चा में रहा है। भारत सरकार पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण बढ़ाकर आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करना चाहती है। इससे विदेशी मुद्रा की बचत होती है, प्रदूषण कम होता है और किसानों को अतिरिक्त बाजार मिलता है।
एथेनॉल का उत्पादन गन्ने के रस, शीरे (मोलासिस) तथा अब मक्का और अन्य अनाजों से भी किया जा रहा है। कुछ लोगों का मानना है कि यदि गन्ने का अधिक हिस्सा एथेनॉल उत्पादन में उपयोग होगा तो चीनी का उत्पादन कम होगा और कीमतें बढ़ेंगी।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान समय में चीनी की कीमतों में वृद्धि का कारण केवल एथेनॉल नहीं है। मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियां, गन्ने का कम उत्पादन, बढ़ी हुई मांग, वैश्विक बाजार और जमाखोरी जैसे कई कारक एक साथ जिम्मेदार हैं। सरकार ने भी एथेनॉल उत्पादन के लिए मक्का और अन्य फसलों के उपयोग को बढ़ावा देकर गन्ने पर निर्भरता कम करने का प्रयास किया है।
चीनी महंगी होने का सबसे अधिक प्रभाव मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों पर पड़ता है। घरेलू खर्च बढ़ जाता है और चाय, मिठाई तथा अन्य खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ने लगती हैं।
मिठाई, बिस्कुट, चॉकलेट, आइसक्रीम, कोल्ड ड्रिंक और बेकरी उत्पादों की लागत बढ़ जाती है। होटल और रेस्टोरेंट भी अपने उत्पादों की कीमतें बढ़ाने को मजबूर हो जाते हैं। इसका असर उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) और खाद्य महंगाई पर भी दिखाई देता है।
चीनी की ऊंची कीमतें किसानों के लिए लाभदायक हो सकती हैं क्योंकि उन्हें गन्ने का बेहतर मूल्य मिलने की संभावना रहती है। लेकिन यदि उत्पादन लागत तेजी से बढ़े, खाद, डीजल और सिंचाई महंगी हो जाए, तो किसानों का लाभ सीमित रह जाता है।
इसलिए आवश्यक है कि किसानों को समय पर उचित मूल्य, आधुनिक तकनीक, गुणवत्तापूर्ण बीज और पर्याप्त सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराई जाए।
सरकार समय-समय पर चीनी उत्पादन, निर्यात, आयात, बफर स्टॉक और एथेनॉल नीति में बदलाव करके बाजार को संतुलित रखने का प्रयास करती है। जमाखोरी पर कार्रवाई, किसानों को समय पर भुगतान और उपभोक्ताओं को उचित मूल्य पर चीनी उपलब्ध कराना सरकार की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उत्पादन बढ़ाने, आधुनिक कृषि तकनीक अपनाने, एथेनॉल और चीनी उत्पादन में संतुलन बनाने तथा बाजार की प्रभावी निगरानी पर ध्यान दिया जाए, तो भविष्य में कीमतों को नियंत्रित रखा जा सकता है।
चीनी की बढ़ती कीमतें केवल एक वस्तु की महंगाई नहीं, बल्कि कृषि, उद्योग, ऊर्जा, व्यापार और उपभोक्ता हितों से जुड़ा व्यापक आर्थिक विषय हैं। एथेनॉल नीति भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन चीनी की कीमतों में वृद्धि के लिए केवल इसे जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। मौसम, उत्पादन, मांग, वैश्विक बाजार और बाजार व्यवस्थाकृये सभी कारक मिलकर कीमतों को प्रभावित करते हैं।
यदि सरकार, किसान, चीनी मिलें और उद्योग संतुलित नीति अपनाएं, तो एक ओर किसानों की आय बढ़ेगी और दूसरी ओर उपभोक्ताओं को भी राहत मिलेगी। चीनी उद्योग का भविष्य उत्पादन वृद्धि, तकनीकी सुधार, पारदर्शी बाजार व्यवस्था और संतुलित एथेनॉल नीति पर निर्भर करेगा। यही संतुलन भारत की खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए सबसे महत्वपूर्ण साबित होगा।।
