लखनऊ। नगर निगम के दावों और जमीनी हकीकत में कितना बड़ा फासला है, इसका जीता-जागता सबूत देखना हो तो नगर निगम के जोन-3 कार्यालय का रुख कर लीजिए। जिस कार्यालय के कंधों पर पूरे जोन को स्वच्छ रखने की जिम्मेदारी है, उसी के मुख्य द्वार के बाहर गंदगी का साम्राज्य फैला हुआ है। कार्यालय के ठीक बाहर बजबजाती नालियां, सड़कों पर बिखरा कचरा और खाली पड़े प्लॉटों का डंपिंग ग्राउंड में तब्दील हो जाना नगर निगम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। जब जिम्मेदार खुद अपने दफ्तर के बाहर सफाई सुनिश्चित नहीं कर पा रहे, तो पूरे जोन की जनता भगवान भरोसे ही है।
क्षेत्र में सफाई व्यवस्था ठप होने के पीछे एक बड़ी वजह प्रशासनिक लापरवाही भी मानी जा रही है। सूत्रों के मुताबिक, एक ही अधिकारी के पास दो-दो महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंप दी गई हैं। कार्यभार की इस अधिकता का सीधा असर फील्ड मॉनिटरिंग पर पड़ रहा है। अधिकारी दफ्तरों से बाहर निकलने का वक्त नहीं निकाल पा रहे हैं, जिसका नतीजा यह है कि क्षेत्र की नालियां चोक हैं और खाली प्लॉट धीरे-धीरे कचरे के बड़े पहाड़ों में तब्दील होते जा रहे हैं।
कागजों पर जोन-3 के पास सफाई कर्मचारियों (सफाई मित्रों) और सफाई खाद्य निरीक्षकों की एक भारी-भरकम फौज तैनात है। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर स्थिति ढाक के तीन पात वाली है। मिलन पार्क से लेकर चंद्रशेखर आजाद पार्क तक की मुख्य सड़क और आस-पास का इलाका गंदगी की चपेट में है। सुबह की शिफ्ट में झाड़ू लगने के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति होती है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि कूड़े का नियमित उठाव न होने से यह पूरा स्ट्रेच अब आवारा पशुओं का अड्डा और डंपिंग यार्ड बनकर रह गया है।
स्थानीय विधायक डॉ. नीरज बोरा ने क्षेत्र की इस बदहाली को लेकर कई बार कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने अधिकारियों के साथ बैठकों में लगातार निर्देश दिए और सफाई व्यवस्था को दुरुस्त करने की चेतावनी भी दी। लेकिन हैरानी की बात यह है कि जनप्रतिनिधि की इस नाराजगी और बार-बार दिए गए निर्देशों का भी जोन-3 के अधिकारियों पर कोई असर नहीं हो रहा है। निगम प्रशासन की यह श्असरहीनताश् सीधे तौर पर जनता की समस्याओं के प्रति उनकी संवेदनहीनता को दर्शाती है।
हर महीने जोन-3 में सफाई व्यवस्था, डीजल, और कर्मचारियों के नाम पर लाखों रुपये के बिल धड़ल्ले से पास किए जा रहे हैं। लेकिन टैक्स देने वाली जनता को बदले में क्या मिल रहा है? चारों तरफ फैली असहनीय बदबू,सड़कों के किनारे उगी झाड़ियां और जलजमाव,संक्रामक बीमारियों (डेंगू, मलेरिया, टाइफाइड) का लगातार बढ़ता खतरा।
बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर जनता के पैसे से पास होने वाले लाखों के बजट का लाभ किसे मिल रहा है, जब धरातल पर सिर्फ बीमारी और बदबू का अंबार लगा है।अपने ही दफ्तर के ठीक बाहर सफाई न करा पाने वाला नगर निगम अब पूरी तरह से बैकफुट पर है। स्थानीय निवासियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अब सीधे तौर पर आला अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग की है। जनता का पूछना है कि लचर पैरवी और लापरवाही के इस खेल में दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई कब होगी? क्या नगर आयुक्त इस गंभीर लापरवाही का संज्ञान लेकर जोन-3 के जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई ठोस एक्शन लेंगे, या फिर कागजी सफाई के दम पर लाखों के वारे-न्यारे यूं ही चलते रहेंगे ?।
