आरटीआई के जरिए पुलिस प्रशासन से मांगे आदेश, कानूनी आधार और नजरबंद नागरिकों का पूरा रिकॉर्ड
पीलीभीत। जनपद में कथित रूप से नागरिकों को उनके ही घरों में नजरबंद (हाउस अरेस्ट) किए जाने के मामले ने अब कानूनी और राजनीतिक तूल पकड़ लिया है। नगर पालिका परिषद के पूर्व चेयरमैन राजीव अग्रवाल श्टीटीश् ने इस कार्रवाई को नागरिकों की स्वतंत्रता और मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन बताते हुए पुलिस प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने अपने अधिवक्ता नीलेश चतुर्वेदी के माध्यम से जनसूचना अधिकारी एवं अपर पुलिस अधीक्षक, को सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत विस्तृत आवेदन सौंपकर पूरे मामले से जुड़े दस्तावेज और रिकॉर्ड सार्वजनिक करने की मांग की है। राजीव अग्रवाल का कहना है कि यह मामला केवल उनके व्यक्तिगत अधिकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन सभी नागरिकों से जुड़ा है जिन्हें कथित तौर पर बिना स्पष्ट कानूनी प्रक्रिया के उनके घरों तक सीमित रखा गया। इसी आधार पर उन्होंने आरटीआई अधिनियम की धारा 7(1) का हवाला देते हुए 48 घंटे के भीतर सूचना उपलब्ध कराने की मांग की है। उनका तर्क है कि मामला सीधे नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जीवन के अधिकार से जुड़ा है, इसलिए इसमें विलंब उचित नहीं होगा।
आरटीआई आवेदन में सबसे पहला सवाल यह उठाया गया है कि आखिर किस सक्षम अधिकारी ने नागरिकों को उनके घरों में नजरबंद रखने का आदेश जारी किया। इसके लिए मूल आदेश अथवा लिखित दिशा-निर्देश की प्रमाणित प्रति उपलब्ध कराने की मांग की गई है।
इसके साथ ही आवेदन में यह भी पूछा गया है कि इस कार्रवाई के लिए किस कानून का सहारा लिया गया। क्या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) 2023, पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) अथवा किसी अन्य कानून की किसी विशेष धारा के तहत यह कदम उठाया गया? पुलिस प्रशासन से इस संबंध में स्पष्ट कानूनी आधार देने को कहा गया है। राजीव अग्रवाल ने कोतवाली और सुनगढ़ी थाना क्षेत्र में कथित रूप से नजरबंद किए गए सभी नागरिकों की सूची भी मांगी है। आवेदन में प्रत्येक व्यक्ति का नाम, पिता का नाम, पता, नजरबंदी की तारीख और समय सहित पूरी प्रमाणित जानकारी उपलब्ध कराने की मांग की गई है।आरटीआई में यह सवाल भी शामिल किया गया है कि जिन घरों के बाहर पुलिस बल तैनात किया गया, उसकी स्वीकृति किस आधार पर दी गई। संबंधित थानों की जनरल डायरी (जीडी) में दर्ज पुलिस कर्मियों की रवानगी और वापसी की प्रमाणित प्रतियां भी मांगी गई हैं, ताकि सरकारी संसाधनों के उपयोग की वैधता स्पष्ट हो सके।
पूर्व चेयरमैन ने संबंधित थाना प्रभारियों और वरिष्ठ अधिकारियों के बीच हुए पत्राचार की प्रतियां भी मांगी हैं। उनका कहना है कि इस कार्रवाई के पीछे हुई प्रशासनिक प्रक्रिया और आदेशों की पूरी श्रृंखला सार्वजनिक होना आवश्यक है। इसके अलावा प्रशासन से यह भी पूछा गया है कि कथित नजरबंदी की अधिकतम अवधि कितनी निर्धारित की गई थी तथा संबंधित व्यक्तियों पर कौन-कौन सी पाबंदियां लगाई गई थीं। इन सभी आदेशों और शर्तों की लिखित प्रति उपलब्ध कराने की भी मांग की गई है।राजीव अग्रवाल ने कहा कि यह लड़ाई केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे समाज की नागरिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए है। उनका कहना है कि यदि निर्धारित समय सीमा के भीतर पुलिस प्रशासन प्रमाणित दस्तावेज और संतोषजनक जवाब उपलब्ध नहीं कराता है तो मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इस आरटीआई आवेदन के सामने आने के बाद जिले के प्रशासनिक और पुलिस महकमे में चर्चा तेज हो गई है। हालांकि, इस मामले में पुलिस प्रशासन की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
