लखनऊ । गुरुद्वारा सदर में छठे पातशाह साहिब श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी का पावन प्रकाश पर्व अत्यंत श्रद्धा, भक्ति एवं हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर गुरुघर के हजूरी रागी भाई गुरविंदर सिंह एवं उनके सहयोगी जत्थे द्वारा अत्यंत अलौकिक एवं भावपूर्ण कीर्तन प्रस्तुत किया गया, जिससे उपस्थित संगतै भाव-विभोर हो गई।गुरुद्वारा सदर के अध्यक्ष सरदार हरपाल सिंह जग्गी ने संगत को संबोधित करते हुए साहिब श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी के जीवन, संघर्ष एवं ऐतिहासिक योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि साहिब श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी का जन्म वर्ष 1595 ईस्वी में पांचवें पातशाह साहिब श्री गुरु अर्जन देव जी एवं माता गंगा जी के पावन गृह में हुआ था। वर्ष 1606 ईस्वी में श्री गुरु अर्जन देव जी की शहादत के उपरांत मात्र 11 वर्ष की आयु में साहिब श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी गुरुगद्दी पर सुशोभित हुए।
उन्होंने कहा कि गुरु साहिब ने श्मीरीश् एवं पीरी श् की दो तलवारें धारण कर आध्यात्मिक एवं सांसारिक शक्ति के समन्वय का संदेश दिया तथा सिख पंथ को ष्संत-सिपाहीष् की अवधारणा से सशक्त किया। वर्ष 1609 ईस्वी में गुरु साहिब द्वारा श्री अकाल तख्त साहिब की स्थापना की गई, जिसने सिख इतिहास को नई दिशा प्रदान की।सरदार जग्गी ने आगे बताया कि सिख शक्ति के बढ़ते प्रभाव के कारण मुगल सम्राट जहांगीर ने गुरु साहिब को ग्वालियर किले में बंदी बना दिया था। वर्ष 1619 ईस्वी में जब गुरु साहिब की रिहाई का निर्णय लिया गया, तब उन्होंने अपने साथ बंदी बनाए गए 52 हिंदू राजाओं की भी मुक्ति की शर्त रखी।गुरु साहिब ने 52 कलियों वाला विशेष चोला धारण किया और 52 राजाओं ने उसकी कलियों को पकड़कर ग्वालियर किले से स्वतंत्रता प्राप्त की। इस महान घटना के कारण गुरु साहिब को ष्बंदी छोड़ दाताष् के नाम से विश्वभर में श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता है। गुरुद्वारा सदर के महामंत्री एवं पूर्व अध्यक्ष सरदार तेजपाल सिंह रोमी ने बताया कि इस पावन अवसर पर परंपरागत गुरु का लंगर आयोजित किया गया स गुरुद्वारा सदर में सैकड़ों श्रद्धालुओं ने पहुंच कर कीर्तन, अरदास एवं गुरु के अटूट लंगर में सहभाग कर आशीर्वाद प्राप्त किया स इस अवसर पर मुख्य रूप से सरदार नरेंद्र सिंह छाबड़ा, सरदार परमजीत सिंह लाली, सुरेंद्र सिंह गोलू सहित बड़ी संख्या में संगत उपस्थित रही।
