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सियासी उठापटक! "जड़ काटने वाले कभी 'गुरु' से बड़े नहीं हो सकते" — दलित राजनीति में मायावती के कद पर अपनों को ही नसीहत

 


विनेश ठाकुर कर्पूरी,सम्पादक

लखनऊ! देश की सियासत में इन दिनों दलित नेतृत्व को लेकर मची होड़ के बीच बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की मुखिया और चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं मायावती (बहनजी) को लेकर एक नया विमर्श खड़ा हो गया है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि आज जो भी नए नेता खुद को दलितों का मसीहा साबित करने की कोशिश कर रहे हैं, वे दरअसल मायावती के त्याग और संघर्ष की बदौलत ही आज इस मुकाम पर पहुंचे हैं।

​विशेषज्ञों और जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं का मानना है कि विपक्षी दलों में बैठे कुछ दलित चेहरे सिर्फ अपने 'आकाओं' को खुश करने के लिए बहनजी पर टिप्पणी करते हैं, जबकि वे भूल जाते हैं कि दलित-पिछड़ों में सत्ता की भूख जगाने और उन्हें 'हुक्मरान' बनाने का श्रेय सिर्फ मायावती को जाता है।

दबंगों पर लगाम और 'शासक' का खिताब

​मायावती के चार बार के मुख्यमंत्रित्व काल को याद करते हुए राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि उन्होंने अपने जीवन को दांव पर लगाकर उत्तर प्रदेश में ऐसा शासन दिया, जिसने बड़े-बड़े दबंगों को कानून के दायरे में ला खड़ा किया। कानून व्यवस्था के मामले में उन्हें आज भी 'सर्वश्रेष्ठ शासक' माना जाता है।

​"वोट बैंक की राजनीति के चक्कर में आज कोई सांसद, विधायक या मंत्री भले ही बन जाए, लेकिन वह मायावती के राजनीतिक कद की बराबरी नहीं कर सकता। वे राजनीति के उस स्कूल की 'गुरु' हैं, जहाँ से पढ़कर आज के कई नेता पूंजीपति और रसूखदार बने हैं।"

सुरक्षित सीटों का गणित और बसपा का वजूद

​इस विमर्श में एक कड़वी सच्चाई यह भी सामने रखी गई है कि आज विभिन्न राजनीतिक दल दलित नेताओं को जो तवज्जो दे रहे हैं, वह सिर्फ इसलिए है क्योंकि जब तक बहुजन समाज का एक बड़ा हिस्सा बसपा से मजबूती से जुड़ा है, तब तक अन्य पार्टियां डर के मारे दलित चेहरों को टिकट और पद बांट रही हैं। सुरक्षित सीटों पर टिकट पाना आज भी दलितों के लिए एक बड़ा राजनीतिक हथियार बना हुआ है, जिसका आधार बहनजी ने ही तैयार किया था।

आंदोलन के नाम पर उत्पीड़न नहीं, सीधे सत्ता की मलाई

​वर्तमान परिदृश्य पर तंज कसते हुए यह बात प्रमुखता से उठाई जा रही है कि मायावती ने कभी अपने समाज के युवाओं को फर्जी मुकदमों या जेल की सलाखों के पीछे धकेलने वाले उग्र आंदोलनों के रास्ते पर नहीं चलाया। उन्होंने सीधे 'सत्ता की चाबी' हथियाकर अपने समाज के लोगों को आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूत (अरबपति) बनाया।

न्यूज का निष्कर्ष: "जड़ मजबूत रखो, जुगाड़ की राजनीति से सरकारें नहीं बनतीं"

​राजनीतिक पंडितों का साफ कहना है कि दो-चार हजार की भीड़ जुटाकर या सामंती ताकतों की गोद में बैठकर मायावती का अपमान करने वाले नेता कभी सम्मान नहीं पा सकते। अगर दलित राजनीति को वास्तव में आगे बढ़ना है, तो उन्हें भाजपा जैसी पार्टियों से संगठनात्मक योजनाएं सीखनी होंगी, न कि अपनों पर ही आरोप-प्रत्यारोप लगाकर अपनी जड़ें काटनी होंगी।

​संक्षेप में कहें तो: राजनीति चाहे कहीं भी की जाए, लेकिन मायावती दलित-पिछड़ों के स्वाभिमान की वो 'जड़' हैं, जिसे उखाड़ पाना नामुमकिन है।

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