फतेहपुर/बाराबंकी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान के तहत करोड़ों रुपए की लागत से बने सामुदायिक सुलभ शौचालय जमीन पर हाथी दांत साबित हो रहे हैं। जिले के विभिन्न ब्लॉकों की तमाम ग्राम पंचायतों में बने ये शौचालय कागजों पर तो स्वच्छता के प्रतीक हैं, लेकिन हकीकत में तालों, टूटी टोटियों और गंदगी के ढेर तले कराह रहे हैं। हालात इतने बदतर हैं कि लोग फिर से खुले में शौच करने को मजबूर हो गए हैं।निंदूरा ब्लॉक के ग्राम पंचायत बड्डूपुर में पीएचसी थाना के पास बना शौचालय हो, निंदूरा के राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय के पास निर्मित शौचालय हो या फिर ग्राम पंचायत घुंघटेर में बना सुलभ शौचालय सबकी कहानी लगभग एक जैसी है। कहीं शौचालय पर ताला लटका है, तो कहीं अंदर की टोटियां गायब हैं। टंकी और सबमर्सिबल की व्यवस्था होने के बावजूद पानी की उपलब्धता नाम मात्र की है। टंकी में जो थोड़ा बहुत पानी चढ़ता भी है, वह कुछ ही देर में खत्म हो जाता है।
सुलभ शौचालयों को सुबह 4 बजे से 8 बजे तक और शाम 4 बजे से रात 8 बजे तक खोलने का निर्देश है, लेकिन जमीनी सच्चाई इससे बिल्कुल उलट है। शौचालय कब खुलेगा और कब बंद होगा, इसका फैसला मनमर्जी से होता है। ग्रामीण बताते हैं कि कई बार वे आवश्यकता पड़ने पर शौचालय के पास पहुंचे, तो या तो ताला मिला या अंदर पानी न होने पर उन्हें बाल्टी भरकर घर से पानी लाने को कह दिया गया।
ग्रामीणों का दर्द है कि अगर शौचालय का इस्तेमाल करना है तो पहले बिजली का इंतजाम देखिए, वरना न पानी मिलेगा, न सफाई रहेगी।बिजली न रहने पर टंकी में पानी नहीं चढ़ पाता, और ऐसे में शौचालय का उपयोग करना और भी मुश्किल हो जाता है। स्वच्छता के नाम पर बने ये भवन ग्रामीणों के लिए सुविधा से अधिक परेशानी का कारण बनती जा रही हैं।
ग्रामीणों ने बताया कि टूटी हुई टोटियों, गंदगी और अव्यवस्था के बारे में कई बार ग्राम प्रधान से शिकायत की गई, लेकिन उन्होंने न तो टोटियां बदलवाने की जहमत उठाई और न ही सफाई व्यवस्था को लेकर गंभीरता दिखाई।एक ग्रामीण ने दुखी मन से कहा, शौचालय की सफाई करने वाले कर्मचारी को प्रधान मेहनताना तक नहीं देते, फिर वह रोज-रोज क्यों आए?”
काफी शिकायतों के बाद कहीं-कहीं एक-दो बार सफाई तो कराई गई, लेकिन नियमित देखभाल के अभाव में शौचालय फिर से गंदगी का ढेर बन गए।
निंदूरा ब्लॉक ही नहीं, जिले के लगभग सभी ब्लॉकों के तमाम गांवों में सामुदायिक शौचालयों की स्थिति दयनीय है। कहीं पानी की टंकी सूखी पड़ी है, तो कहीं शौचालयों पर स्थायी रूप से ताला झूलता दिख जाता है। जिन शौचालयों के दरवाजे खुले हैं, वहां इतनी गंदगी है कि अंदर कदम रखना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे हालात में ग्रामीणों के पास खुले में शौच पर लौटने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।
सरकार एक ओर महिला सशक्तिकरण और उनकी सुरक्षा को लेकर बड़े-बड़े दावे करती है, तो दूसरी ओर स्वच्छ भारत मिशन के तहत बने शौचालयों की बदहाली ग्रामीण महिलाओं की मजबूरी और असुरक्षा दोनों बढ़ा रही है।शौचालयों में गंदगी, पानी की कमी और तालों के कारण महिलाएं अब भी सुबह-शाम अंधेरे का इंतजार कर खुले में शौच के लिए जाने को मजबूर हैं।
ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि खेतों और सुनसान स्थानों पर खुले में शौच के लिए जाना हमेशा खतरे से खाली नहीं होता। ऐसे में छेड़छाड़ व दुराचार की आशंका हमेशा बनी रहती है। स्थानीय प्रशासन और ग्राम पंचायतों की लापरवाही महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा दोनों को खतरे में डाल रही है। सवाल यह है कि जब शौचालय ही उपयोग लायक नहीं, तो महिला सम्मान और सुरक्षा के दावे किसके लिए?
सुलभ शौचालयों की इस दयनीय स्थिति पर जब एडीओ पंचायत अनिल कुमार सिंह से बात की गई, तो उन्होंने कहा कि मामले को गंभीरता से लिया जाएगा।एडीओ पंचायत अनिल कुमार सिंह ने बताया,मामले की जांच कराकर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। शौचालयों की स्थिति तुरंत बेहतर कराने के निर्देश दिए जाएंगे, ताकि ग्रामीणों को सुविधा मिल सके।
अब देखने वाली बात यह होगी कि कागजों में चल रही कार्रवाई हकीकत में कब दिखेगी और स्वच्छ भारत मिशन के नाम पर बने ये बदहाल शौचालय सचमुच स्वच्छता और सम्मान के प्रतीक बन पाएंगे या नहीं।
