बांदा। भगवान श्री कृष्ण और उनकी बहन सुभद्रा के संबंध में भाई दूज का पर्व विशेष महत्व रखता है। इस दिन से जुड़ी कुछ अनोखी बातें हैं जो इस पर्व की पवित्रता और विशेषता को और बढ़ाती हैं। यहां कुछ खास बातें दी गई हैंरूमाना जाता है कि भाई दूज का पर्व उस समय से प्रचलित है, जब भगवान श्री कृष्ण ने राक्षस नरकासुर का वध किया था। जब वे नरकासुर का संहार कर लौटे, तो उनकी बहन सुभद्रा ने उनका स्वागत करते हुए तिलक लगाया और उनकी रक्षा के लिए प्रार्थना की। इस घटना के बाद से यह पर्व बहन-भाई के प्रेम का प्रतीक बन गया। भाई दूज के दिन बहन अपने भाई को तिलक कर उसकी लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और खुशियों की कामना करती है। तिलक के साथ भाई की आरती उतारी जाती है और उसे मिठाई खिलाई जाती है। यह रिवाज भाई-बहन के अटूट संबंध को दर्शाता है, जिसमें बहन अपने भाई के सुखी जीवन के लिए प्रार्थना करती है और भाई उसकी सुरक्षा का वचन देता है।
कहानी के अनुसार, भगवान कृष्ण जब नरकासुर वध करके लौटे, तो सुभद्रा ने उन्हें विशेष सत्कार दिया था। उन्होंने श्रीकृष्ण के माथे पर तिलक लगाया, मिठाई खिलाई और दीयों की माला से उनका स्वागत किया। इस स्वागत से प्रेरित होकर आज भी बहन अपने भाई को तिलक लगाती है और उसकी खुशहाली की कामना करती है। कृष्ण और सुभद्रा की कहानी में यह संकेत मिलता है कि भाई दूज पर भाई बहन को उपहार देते हैं। यह उपहार बहन के प्रति भाई के स्नेह और देखभाल को दर्शाता है, जो बहन के प्यार और प्रार्थना के प्रतिदान के रूप में होता है। भगवान श्रीकृष्ण और सुभद्रा के अलावा भाई दूज के पर्व का संबंध यमराज और उनकी बहन यमुनाजी की कथा से भी है। ऐसा माना जाता है कि यमुनाजी ने भी अपने भाई यमराज को तिलक कर उनके सुखी और स्वस्थ जीवन की कामना की थी। इससे भाई दूज का महत्व और भी बढ़ जाता है, जिसमें भाई-बहन के रिश्ते में प्रेम और आशीर्वाद का आदान-प्रदान होता है। इस प्रकार, भाई दूज का पर्व कृष्ण और सुभद्रा के प्रेमपूर्ण रिश्ते को ध्यान में रखते हुए मनाया जाता है, जिसमें भाई और बहन एक-दूसरे के लिए शुभकामनाएं और आशीर्वाद का संचार करते हैं।
