मिर्जापुर। किसान की खेती के लिए सबसे जरूरी साधन बीज,खाद और पानी हैं। सरकार किसानों को राहत देने के लिए खाद पर सब्सिडी देती है और तय मूल्य (एमआरपी) पर बिक्री सुनिश्चित करने की कोशिश करती है। लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। सरकार ने यूरिया का एमआरपी 266 रुपए प्रति बोरी तय कर रखा है। लेकिन खुदरा में दुकानदार को यह कीमत पर नहीं मिलता। लेकिन ऑफ सीजन में दुकानदार तक यूरिया 285 रुपए में पहुँचता है।
मुख्य सीजन में यह बढ़कर 300 रुपए से ऊपर हो जाता है। डीलर्स दबाव डालते हैं कि खुदरा विक्रेता हर बोरी यूरिया के साथ एक बोरी सल्फर या अन्य उत्पाद भी खरीदे। खुदरा विक्रेता के पास कोई और विकल्प नहीं होता और उन्हें मजबूरी में यह अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ता है।
सरकार ने डीएपी का मूल्य 1,350 रुपए प्रति बोरी तय किया है। लेकिन हकीकत यह है कि खुदरा विक्रेता को डीलर्स से डीएपी 1,450 रुपए में मिलता है। इसके अलावा उन्हें साथ में कुछ अतिरिक्त उत्पाद भी खरीदने पड़ते हैं। जब खुदरा विक्रेता महंगा माल खरीदेगा,तो किसानों को डीएपी 1,500 रुपए या उससे ऊपर में ही उपलब्ध हो पाता है।
इस पूरी व्यवस्था में खुदरा विक्रेता के पास कोई समाधान नहीं है। अगर वे डीलर्स की शर्तें नहीं मानते तो उन्हें खाद का कोटा ही नहीं मिलता।
किसान जब महंगी खाद खरीदते हैं,तो गुस्सा खुदरा विक्रेता पर निकालते हैं। जब लोगों की शिकायतें जिलाधिकारी तक पहुंचती है तो कई बार प्रशासन खुदरा विक्रेता का लाइसेंस तक जब्त कर लेता है।लेकिन असल गड़बड़ी करने वाले थोक व्यापारी और डीलर्स के खिलाफ कार्रवाई शायद ही कभी होती है। वे बेधड़क अपना कारोबार जारी रखते हैं।
यूरिया और डीएपी जैसे उर्वरक किसानों की रीढ़ हैं। लेकिन सप्लाई चेन में मौजूद अनियमितताओं और डीलर्स की मनमानी की वजह से किसान महंगी खाद लेने को मजबूर हैं। खुदरा विक्रेता भी इस दबाव का शिकार हैं। अगर सरकार और प्रशासन असली जिम्मेदारों यानी थोक व्यापारी और डीलर्स पर सख्ती नहीं करेंगे,तो यह समस्या यूं ही जारी रहेगी और खेती की लागत लगातार बढ़ती जाएगी।
