- 1994 से व्यवस्था को समझते-समझते यहां तक पहुंचा हूं, अब लक्ष्य है अतिपिछड़े-अतिदलित समाज को सत्ता में हिस्सेदारी दिलाना
- बसपा से शुरू हुआ राजनीतिक सफर, पत्रकारिता ने दी स्वतंत्र पहचान; पांच पार्टियां बनवाने के प्रयास के बाद अब इंडियन जन सेवा दल के मंच से जनसंख्या अनुपात में हिस्सेदारी की मुहिम
विनेश ठाकुर ‘कर्पूरी’ की कलम से
सम्पादक, विधान केसरी लखनऊ एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष, इंडियन जन सेवा दल
मित्रों, जब से हमने इंडियन जन सेवा दल का गठन किया है, नंदवंशियों में ही नहीं, बल्कि सभी वंचित जातियों, राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों में भी सत्ता में जाने और सत्ता में हिस्सेदारी लेने की चर्चा शुरू हुई है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता।
मैं तो वर्ष 1994 में हुए एक विधानसभा चुनाव के दौरान प्रत्याशी के साथ रहते-रहते राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था के साथ-साथ जातिगत व्यवस्था को भी समझ गया था।
पहले बसपा में मुझे विधानसभा क्षेत्र के सोलह सेक्टरों में से एक सेक्टर का इंचार्ज बनाया गया। उसके बाद बहनजी ने अपने हस्ताक्षर से मुझे विधानसभा क्षेत्र नगीना का महामंत्री बनाया। फिर बिजनौर का जिला महामंत्री और उसके बाद जिले का सलाहकार बनाया गया।
छोटे नेताओं का प्यार मिला, लेकिन जातिगत भेदभाव भी देखा
तब भी मुझे देखने को मिला कि बसपाइयों ने हमें भले ही ब्राह्मण, वैश्य और क्षत्रिय के विरुद्ध बताकर विरोधी बनाया, लेकिन सबसे बड़े विरोधी तो यहां भी कई लोग निकले।
मुझसे छोटे नेता प्यार करते थे, लेकिन मंडल स्तर के कुछ नेता जातिगत भेदभाव करने में कोई कमी नहीं छोड़ते थे। मेरी जागरूकता कहें, जातिगत प्यार कहें अथवा मेरा तेज-तर्रार होना—यही कई लोगों की नफरत का कारण बना।
इसी कारण मुझे वर्ष 2002 में अम्बेडकर ज्योति का मालिक-संपादक बनकर खुले आकाश में उड़ने का रास्ता तलाशना पड़ा।
जिन लोगों ने मुझे मनुवादियों का गुलाम बताकर उनके खिलाफ भड़काया, वही लोग बाद में खुद गुलामी कराने में लगने लगे। उन्हें मेरा तेज-तर्रार होना तो पसंद था, लेकिन मेरी जाति से उतनी ही नफरत थी, जितनी शायद दूसरे लोग भी न करते हों।
पत्रकारिता ने दिलाई जी-हुजूरी से मुक्ति
अखबार के माध्यम से मैं खुद को जी-हुजूरी से मुक्त कराने में कामयाब होने लगा, लेकिन अखबार का नाम अम्बेडकर ज्योति होने के कारण पत्रकारों और नेताओं के बीच वह पहचान नहीं बना पा रहा था, जिसका मैं खुद को हकदार मानता था।
कुछ घटिया किस्म के पत्रकारों को मेरा पत्रकार बनना भी रास नहीं आ रहा था, जबकि कुछ सहयोगी मित्र हमेशा मेरे साथ खड़े रहे।
जातिगत भेदभाव के चलते कुछ पत्रकारों की टोली ने मुझे झूठे मुकदमे में भी फंसा दिया, लेकिन मैं रुका नहीं।
एसपी की वह बात आज भी याद है
मुझे आज भी वह दिन याद है, जब एक झोलाछाप पत्रकार ने पहले मेरे विरुद्ध मुकदमा दर्ज कराने वाले का सहयोग किया और बाद में मुझे अपने झांसे में रखने के लिए फोन कर समझौता कराने की बात कही।
मैं तैयार हो गया।
लेकिन उस समय मुझे खुशी हुई, जब तत्कालीन एसपी ने मुझसे कहा—
“आप तो मेरा ट्रांसफर कराने लखनऊ गए थे, क्या हुआ, कराया नहीं?”
मैंने पूछा—“कौन कह रहा है?”
कप्तान साहब ने बताया कि जो व्यक्ति आपका फैसला कराने की बात कर रहा है, उसी ने यह बात कही है।
मेरा जवाब था—
“कप्तान साहब, न मेरा कोई गॉडफादर है, न समर्थक और न सहयोगी। उसके बावजूद किसी पत्रकार ने मुझे आपका ट्रांसफर कराने लायक समझकर जो मेरी प्रशंसा की है, वह मेरा हौसला बढ़ाने वाली है। मुझे पता है कि मैं फिलहाल इस लायक नहीं हूं, लेकिन यदि उसे यह गलतफहमी है कि मैं बड़े अफसर का तबादला करा सकता हूं, तो मेरे लिए इससे बेहतर क्या हो सकता है?”
खैर, फैसला हुआ और हम अपने पत्रकारिता मिशन पर आगे बढ़ते गए।
जब मंत्री ने पूछा—“अम्बेडकर के नाम से भी कोई अखबार होता है?”
वर्ष 2006 में मुझे एक ऐसी घटना का सामना करना पड़ा, जिसमें जातिगत पहचान और अम्बेडकरवादी होने का खामियाजा भी महसूस हुआ।
एक मंत्री जी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में मेरा परिचय हुआ। मैंने बताया कि मैं अम्बेडकर ज्योति अखबार का संपादक हूं।
मंत्री जी ने बिना एक पल गंवाए कहा—
“अम्बेडकर के नाम से भी कोई अखबार होता है?”
कसम से, उस दिन मैंने अपमानित महसूस करते हुए अखबार का नाम बदलने का फैसला कर लिया।
हमने नए टाइटिल विधान केसरी के लिए आवेदन किया और हमें विधान केसरी का संपादक बनने में देर नहीं लगी।
फिर शुरू हुई पत्रकारिता की धुआंधार बल्लेबाजी
विधान केसरी के माध्यम से हमने न सिर्फ पत्रकारिता में धुआंधार बल्लेबाजी की, बल्कि बसपा में रहते हुए हमसे नफरत करने वालों को भी बता दिया कि—
- विनेश ठाकुर को आप लोगों ने भले ही बहनजी की नीति और सोच से अलग होकर अपमानित किया हो, लेकिन यह विनेश ठाकुर तुम जैसे लोगों के खाने की खीर नहीं है।
- पत्रकारिता में बढ़ते कदमों के चलते आपके भाई ने कई लोगों को पार्टी बनवाकर सरकार में किंगमेकर बनने का भी कई बार प्रयास किया।
- लेकिन दूसरी जातियों के कई लोगों को मैं जातिगत रूप से पसंद नहीं था। जिन लोगों के लिए मैंने पार्टियां बनवाईं, उन्हें भी मेरा असरदार व्यक्तित्व पसंद नहीं आया।
- एक के बाद एक पांच पार्टियां बनवाने के बाद मैं शांत हो गया और लखनऊ शिफ्ट हो गया।
- अपने समाज के किसी व्यक्ति को आगे लाने की कोशिश भी की
- लखनऊ आने के बाद भी मन में यही विचार रहता था कि अपने समाज के किसी व्यक्ति को पार्टी बनवाकर एक मजबूत राजनीतिक प्लेटफार्म तैयार किया जाए।
- कई जिम्मेदार साथी जानते हैं कि मैंने जिन-जिन लोगों के सामने यह प्रस्ताव रखा, उनमें से कोई आगे नहीं आया।
- शायद वे भी सामाजिक संगठनों को अपना धंधा समझते-समझते मुझे उस धंधे को बंद कराने वाला समझने लगे थे।
- लीवर खराब हुआ तो मन में एक संकल्प लिया
जब मेरा लीवर खराब हुआ तो मैंने मन ही मन एक योजना बनाई—
अगर ट्रांसप्लांट कामयाब हुआ और मेरी जान बची, तो मैं खुद अपनी पार्टी के माध्यम से बहुजन मिशन को मजबूत करूंगा।
सत्ता तक पहुंचने वाले दलित-पिछड़ों के साथ-साथ अतिपिछड़ी और अतिदलित जातियों में भी उनके अपने समाज का नेतृत्व खड़ा करूंगा और बहुजन समाज को सत्ता तक पहुंचाने का प्रयास करूंगा।
लेकिन मैंने यह नहीं सोचा था कि वर्ष 1994 से जो जातिगत द्वेष देखता आया हूं, वह इतने वर्षों बाद भी खत्म नहीं हुआ होगा।वह खत्म नहीं हुआ।
जिसे मुख्यमंत्री का दावेदार बनाया, वही विरोधी निकला
पार्टी बनाने के बाद चर्चाओं में आकर मैंने कई नेताओं को मुख्यमंत्री बनाने के लिए तन, मन और धन से जुटकर योजना बनाई।
पैसे खर्च करने की बात कही और खर्च भी किए।
लेकिन जिस व्यक्ति को मुख्यमंत्री का दावेदार घोषित किया, वही हमारी जाति का सबसे बड़ा विरोधी साबित हुआ।
कई लोगों ने मुझसे कहा
“सैन, सविता, नंद, पाल, प्रजापति, सैनी, कश्यप, विश्वकर्मा, बाल्मीकि, कोरी, खटीक आदि जातियों को जिस तरह आप बीस-बीस विधायक बनाने की बात करते हैं, यह सही नहीं है। इन जातियों के किसी विधानसभा क्षेत्र में पांच, सात या दस हजार वोट हैं। इन्हें एमएलसी बनाया जा सकता है, विधायक नहीं।”
तब मुझे लगा कि यदि छोटे-छोटे अथवा भाजपा परस्त नेताओं की सोच यह है, तो बड़ी पार्टियों की सोच को तो मैं पहले से ही अच्छी तरह जानता हूं।
फिर उन्हें प्रस्ताव देने में क्या दिक्कत है?
मैंने सभी दलों को प्रस्ताव भेजे हैं
मैंने सभी को प्रस्ताव भेजे हैं।
आप लोगों में से कई साथियों ने बहनजी सहित तमाम नेताओं से मुलाकात कराने का आश्वासन भी दिया है।
लेकिन मित्रों, आप क्या समझते हैं कि मैं मुलाकात नहीं कर सकता?
मेरे लिखने के कई मतलब होते हैं।
मेरा उद्देश्य यह भी है कि अतिपिछड़े-अतिदलित समाज को सत्ता में ले जाने की हमारी योजना का इतना प्रचार हो जाए कि एक नेता को प्रस्ताव भेजें तो बाकी दल भी उसे समझ जाएं।
यदि कोई राजनीतिक दल मेरी योजना को मुझसे अलग मानकर भी स्वीकार कर ले और जनसंख्या अनुपात में टिकट वितरण शुरू कर दे, तो मुझे पार्टी चलाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।
मकसद पार्टी चलाना नहीं, हिस्सेदारी दिलाना है
हमारा उद्देश्य केवल पार्टी चलाना नहीं है।
हमारा उद्देश्य है कि जिन समाजों को वर्षों से अपेक्षित राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं मिला, उन्हें जनसंख्या अनुपात के आधार पर राजनीतिक हिस्सेदारी मिले।
लेकिन अभी तक कोई बड़ा दल हमारी योजना पर काम करने के लिए तैयार दिखाई नहीं देता।
इसी कारण हमने उम्मीद नहीं छोड़ी है।
जातियों के बीच राजनीतिक-सामाजिक गठबंधन बनाकर इंडियन जन सेवा दल नामक प्लेटफार्म को मजबूत किया जा सकता है और जनसंख्या अनुपात में सभी समाजों को हिस्सेदारी देने का प्रयास किया जा सकता है।
मिशन जारी रहेगा
मित्रों, हमारा सफर लंबा रहा है।
1994 से राजनीतिक व्यवस्था को समझते-समझते, पत्रकारिता की चुनौतियों से लड़ते हुए, सामाजिक और जातिगत भेदभाव का सामना करते हुए हम यहां तक पहुंचे हैं।
संघर्ष जारी है।
और आपका यह मिशन सफल होकर रहेगा।
विनेश ठाकुर ‘कर्पूरी’
सम्पादक, दैनिक विधान केसरी, लखनऊ
एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष, इंडियन जन सेवा दल
