लखनऊ। राजधानी में प्रशासन के दावों की पोल खुलने में अब दो दिन से ज्यादा का वक्त भी नहीं लगता! चारबाग बासमंडी चैराहे और आईटीआई कॉलेज के बाहर का हाल कुछ ऐसा ही बयां कर रहा है। हाल ही में नगर निगम ने बड़ी-बड़ी डींगें हांकते हुए सड़क को अतिक्रमण और खड़े वाहनों से मुक्त कराया था, लेकिन लगता है कि निगम का यह बुलडोजर और कार्रवाई का खौफ महज दो दिनों का मेहमान साबित हुआ।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि नाक के नीचे यानी ट्रैफिक पुलिस की मौजूदगी में नो-पार्किंग जोन में ये गाड़ियां दोबारा कैसे वापस आ गईं? क्या वर्दीवालों की आंखें बंद हैं या फिर इन अवैध पार्किंग चलाने वालों पर किसी खास श्संरक्षणश् का हाथ है ?
चारबाग बासमंडी चैराहा हो या आईटीआई कॉलेज के बाहर का इलाका, सड़क किनारे खड़े बेतरतीब वाहन आम जनता के लिए जी का जंजाल बन चुके हैं। रोजमर्रा लगने वाला जाम चीख-चीखकर प्रशासनिक दावों की धज्जियां उड़ा रहा है। जब चंद दिनों पहले नगर निगम ने सड़क खाली कराई थी, तो उम्मीद बंधी थी कि अब राहत मिलेगी। लेकिन चंद घंटों की सियासत और दिखावे के बाद स्थिति जस की तस हो गई।
आखिरकार डीसीपी ट्रैफिक और डीसीपी मध्य इस गंभीर लापरवाही पर आंखें मूंदकर क्यों बैठे हैं? क्या यातायात नियमों का पालन कराना सिर्फ कागजी खानापूर्ति बनकर रह गया है?
स्थानीय नागरिकों और राहगीरों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। जनता की दो टूक मांग है कि सिर्फ दिखावे के अभियान चलाने से काम नहीं चलेगा। नो-पार्किंग में खड़े होने वाले इन वाहनों पर भारी जुर्माना लगे और जरूरत पड़ने पर गाड़ियां सीज की जाएं। ट्रैफिक पुलिस और स्थानीय पुलिस की मिलीभगत या सुस्ती की जांच कर सख्त कार्रवाई हो। नगर निगम और पुलिस विभाग मिलकर कोई ठोस और स्थायी समाधान निकालें, वरना राजधानी की सड़कें यूं ही अतिक्रमण के हवाले दम तोड़ती रहेंगी।
