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मिर्जापुर: संभावनाशील एवं भविष्य की सब्जी फसलों को मुख्यधारा में समावेशन,पोषण एवं आर्थिक सुरक्षा को बढ़ावा देने की पहल


मिर्जापुर। आईसीएआर-भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान, वाराणसी द्वारा संभावनाशील एवं भविष्य की सब्जी फसलों को मुख्यधारा में समावेशनरू उत्पादन तकनीक, बीज प्रणाली एवं बाजार संपर्क” विषय पर आयोजित 10 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का बुधवार को सफलतापूर्वक समापन हुआ। यह प्रशिक्षण कार्यक्रम 21 से 30 सितंबर तक आयोजित किया गया। प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्देश्य प्रतिभागियों में अवसर सब्जी फसलों के पोषण, औषधीय, आर्थिक एवं व्यावसायिक महत्व के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना तथा उनकी क्षमता का विकास करना था। प्रतिभागियों को इन फसलों के पोषण एवं चिकित्सीय महत्व के साथ-साथ उनकी समृद्ध आनुवंशिक विविधता एवं संभावनाओं से भी अवगत कराया गया। इसके अतिरिक्त, छोटे एवं सीमांत कृषकों की कृषि प्रणालियों के लिए इन फसलों की उपयुक्तता, उत्पादन तकनीकों तथा इनके व्यवस्थित अध्ययन, लक्षण-वर्णन, उपयोग एवं संरक्षण के लिए जैव-प्रौद्योगिकी एवं जैव-सूचनाविज्ञान उपकरणों के अनुप्रयोग पर भी जानकारी प्रदान की गई। प्रशिक्षण कार्यक्रम में देश के विभिन्न भागों से शिक्षक, वैज्ञानिक, विषय वस्तु विशेषज्ञ तथा अन्य प्रतिभागियों ने भाग लिया।

समापन समारोह में डॉ. ए. बी. राय, पूर्व प्रमुख, सब्जी संरक्षण प्रभाग, आईसीएआर-आईआईवीआर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने संभावनाशील एवं भविष्य की सब्जी फसलों पर व्यवस्थित एवं समन्वित अनुसंधान किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया और इन्हें भविष्य की पोषण सुरक्षा एवं आर्थिक समृद्धि के लिए महत्वपूर्ण फसलें बताया। उन्होंने इन फसलों को शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में शामिल करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया, ताकि विद्यार्थियों एवं युवा पेशेवरों को इनके बारे में अधिक जानकारी एवं अनुभव प्राप्त हो सके। डॉ. राय ने देशभर में उपलब्ध संभावनाशील एवं भविष्य की सब्जी फसलों के व्यवस्थित संग्रह, लक्षण-वर्णन, मूल्यांकन एवं दस्तावेजीकरण के लिए एक राष्ट्रीय नेटवर्क कार्यक्रम विकसित करने का आह्वान किया। उन्होंने इन फसलों को किसानों द्वारा व्यापक रूप से अपनाने के लिए मानकीकृत उत्पादन तकनीकों एवं समग्र पैकेज ऑफ प्रैक्टिसेज के विकास की आवश्यकता पर भी बल दिया। डॉ. राजेश कुमार, निदेशक, आईसीएआर-आईआईवीआर ने संभावनाशील एवं भविष्य की सब्जी फसलों की अप्रयुक्त क्षमता का पता लगाने एवं उसका समुचित उपयोग करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने विशेष रूप से जैविक एवं अजैविक तनावों के प्रति अनुकूलन क्षमता, पोषण एवं औषधीय गुणों, जलवायु अनुकूलता तथा व्यावसायिक विस्तार की संभावनाओं को रेखांकित किया। उन्होंने इन फसलों को कृषि विविधीकरण के एक व्यवहार्य विकल्प के रूप में बढ़ावा देने तथा पोषण एवं आर्थिक सुरक्षा को सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर बल दिया।

कार्यक्रम का नेतृत्व डॉ. राकेश कुमार दुबे, प्रधान वैज्ञानिक एवं कार्यक्रम निदेशक ने किया, जबकि इसका समन्वय संस्थान के वैज्ञानिकों डॉ. विकास सिंह, डॉ. ज्योति देवी एवं डॉ. केशव के. गौतम द्वारा किया गया। डॉ. राकेश कुमार दुबे ने कहा कि संभावनाशील एवं भविष्य की सब्जी फसलों को मुख्यधारा में शामिल करने के लिए एक समेकित एवं बहुआयामी दृष्टिकोण आवश्यक है, जिसमें आनुवंशिक संसाधनों का संरक्षण, फसल सुधार, उत्पादन तकनीक, गुणवत्तापूर्ण बीज प्रणाली, मूल्य संवर्धन, बाजार संपर्क तथा उपभोक्ता जागरूकता को शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि समन्वित अनुसंधान, प्रौद्योगिकी विकास एवं विभिन्न हितधारकों की भागीदारी के माध्यम से इन संभावनाशील अवसर फसलों को पारंपरिक रूप से कम उपयोग किए जाने वाले संसाधनों से आर्थिक रूप से व्यवहार्य एवं पोषण की दृष्टि से महत्वपूर्ण फसलों में परिवर्तित किया जा सकता है। 10 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों को विशेषज्ञों के साथ संवाद करने तथा संभावनाशील एवं भविष्य की सब्जी फसलों से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विस्तृत जानकारी एवं व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करने का अवसर मिला। डॉ. दुबे ने बताया कि संस्थान द्वारा संभावनाशील एवं भविष्य की सब्जी फसलों की 15 से अधिक किस्में विकसित की जा चुकी हैं।

कार्यक्रम का समापन प्रतिभागियों को प्रशिक्षण प्रमाण-पत्रों के वितरण के साथ हुआ। यह प्रशिक्षण कार्यक्रम आईसीएआर-आईआईवीआर की सतत कृषि, पोषण सुरक्षा तथा किसानों की आजीविका एवं आय में वृद्धि के लिए संभावनाशील एवं भविष्य की सब्जी फसलों को मुख्यधारा में शामिल करने की प्रतिबद्धता को और सुदृढ़ करता है।


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