कर्नाटक में सूखे से किसान बेहाल, मुआवजे पर सियासत तेज
September 28, 2026
कर्नाटक में मानसून की बेरुखी ने एक बार फिर किसानों की चिंता बढ़ा दी है. खेतों में फसलें सूख रही हैं, कई इलाकों में बुआई तक नहीं हो पाई है. अब सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल है, किसानों को राहत कैसे मिलेगी और पैसा कहां से आएगा? इस सूखे को लेकर विधानसभा का विशेष सत्र हुआ है. सरकार ने राहत का ऐलान भी किया, केंद्र से मदद मांगी गई, और इसी के साथ शुरू हो गई है सूखे पर सियासत.
कर्नाटक में इस साल मानसून का संकट कितना गंभीर है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सितंबर के आखिरी सप्ताह तक राज्य के 177 तालुकों को आधिकारिक तौर पर सूखा प्रभावित घोषित किया जा चुका है. सरकार के मुताबिक करीब 217 तालुकों में बारिश की कमी दर्ज की गई है, और यह संख्या 200 के पार जाने की आशंका भी जताई गई है. सितंबर के आखिर तक राज्य में सामान्य से करीब 35 से 36 फीसदी कम बारिश दर्ज होने की रिपोर्ट है. यानी संकट सिर्फ बारिश का नहीं है, बल्कि यह संकट खेत, पानी, पशुओं को लेकर भी है. सबसे बड़ा संकट है किसान की आमदनी का. बारिश की कमी का सीधा असर खरीफ की बुआई पर पड़ा है.
मंडया जैसे इलाकों में रागी की बुआई का आंकड़ा बेहद नीचे चला गया. रिपोर्ट के मुताबिक सितंबर के मध्य तक जिले में लक्ष्य के मुकाबले महज करीब 1.9 फीसदी क्षेत्र में रागी की बुआई हो पाई थी. राज्य स्तर पर भी खरीफ बुआई के क्षेत्र में कमी दर्ज हुई है. रिपोर्ट के मुताबिक सितंबर की शुरुआत तक पिछले साल की तुलना में धान, दालों और मोटे अनाज के क्षेत्र में बड़ी गिरावट थी. किसान के लिए इसका मतलब साफ है, बीज, खाद और जुताई का पैसा तो गया और अब खेत से फसल नहीं निकली तो आमदनी कहां से आएगी? और यहीं से शुरू होती है राहत की मांग.
कर्नाटक सरकार ने सूखा प्रभावित किसानों के लिए 2,500 रुपये प्रति किसान की इनपुट सब्सिडी देने का ऐलान किया है. पहले चरण में करीब 45 से 50 लाख किसानों को इसका लाभ देने की बात कही गई है और इसके लिए लगभग 1,250 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है. सरकार का कहना है कि यह सहायता केंद्र से NDRF की मदद का इंतजार किए बिना तत्काल राहत के तौर पर दी जा रही है. इसके अलावा सूखा प्रभावित किसानों के कृषि और संबंधित ऋणों की अदायगी के लिए 12 महीने का मोरेटोरियम और प्रभावित क्षेत्रों में पुनर्भुगतान अवधि बढ़ाने की बात भी कही गई है. सरकार ने यह भी बताया है कि पशुओं के लिए चारा और फॉडर बैंक जैसी व्यवस्थाओं पर काम किया जा रहा है.
अब यहां सवाल उठता है, कि 2,500 रुपये की राहत, क्या हजारों रुपये के नुकसान की भरपाई कर पाएगी? कर्नाटक सरकार ने शुरुआती 101 सूखा प्रभावित तालुकों में फसल और आर्थिक नुकसान का अनुमान करीब 18 हजार करोड़ रुपये लगाया था. बाद में अधिक तालुकों के सूखा प्रभावित होने के साथ सरकार ने संभावित कुल नुकसान का अनुमान करीब 40 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचने की बात कही. यानी सरकार का अपना आंकलन ही बता रहा है, कि संकट का आकार कितना बड़ा है.
विधानसभा में सूखे पर विशेष चर्चा के दौरान सरकार ने केंद्र से अतिरिक्त सहायता की मांग की है. मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने केंद्र से राज्य द्वारा मांगी गई करीब 3,705 करोड़ रुपये की सहायता में से 50 फीसदी राशि अंतरिम तौर पर जारी करने की मांग की है. राज्य ने NDRF के तहत सहायता की मांग की है.
सरकार का तर्क है कि किसानों की मदद के लिए राज्य अपने स्तर पर पैसा लगा रहा है, लेकिन केंद्र से मिलने वाली सहायता भी जरूरी है. वहीं विपक्ष का कहना है कि 2,500 रुपये की सहायता पर्याप्त नहीं है. BJP ने सूखा राहत के तौर पर 50 हजार रुपये प्रति एकड़ मुआवजे की मांग रखी है. साथ ही सरकार से उसकी वित्तीय स्थिति तथा गारंटी योजनाओं के खर्च पर श्वेतपत्र की मांग की है. यानी विधानसभा में सवाल सिर्फ सूखे का नहीं था, सवाल अब सरकार के खजाने का भी है.
इसी बीच सरकार के मंत्री एच.सी. बालकृष्ण का बयान भी चर्चा में आ गया है. रामनगर में दिव्यांगों की शिकायतें सुनते हुए उन्होंने कहा कि सरकार को एक तरफ अपनी गारंटी योजनाएं जारी रखनी हैं, दूसरी तरफ सूखे से परेशान किसानों को भी आर्थिक सहायता देनी है. बालकृष्ण के मुताबिक अगर गारंटी योजनाएं नहीं होतीं तो वित्तीय प्रबंधन आसान होता, लेकिन सरकार ने ये योजनाएं लोगों के कल्याण के लिए शुरू की हैं. अब उसे वेतन, विकास कार्य, गारंटी योजनाएं और किसानों की राहत सब को बजट के भीतर संभालना है. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार या मुख्यमंत्री की गारंटी योजनाएं बंद करने की मंशा नहीं है.
कर्नाटक के 2026-27 बजट विश्लेषण के मुताबिक पांच गारंटी योजनाओं पर अनुमानित खर्च करीब 51,286 करोड़ रुपये है, जो कुल खर्च का लगभग 12 फीसदी है. यहीं से राजनीतिक बहस का असली मुद्दा सामने आता है. क्या मौजूदा वित्तीय प्रतिबद्धताओं के बीच सूखे जैसे आपात संकट के लिए पर्याप्त गुंजाइश है?
सरकार इसे वित्तीय संतुलन की चुनौती बता रही है, विपक्ष इसे सरकार की प्राथमिकताओं से जोड़ रहा है, लेकिन इन दोनों के बीच खड़ा है कर्नाटक का किसान.
किसान के लिए राजनीति से बड़ा सवाल है, अगली फसल कैसे बोएगा? बारिश नहीं हुई तो नुकसान, बुआई नहीं हुई तो नुकसान, कर्ज की किस्त आई तो दबाव और अगर पानी की कमी आगे भी जारी रही तो अगली फसल का संकट भी सामने दिखाई दे रहा है. सरकार ने सूखा राहत, इनपुट सब्सिडी, ऋण राहत और केंद्र से आर्थिक सहायता की मांग जैसे कदम उठाए हैं, लेकिन नुकसान का अंतिम आंकड़ा अभी पूरी तरह सामने नहीं आया है. सरकार ने अलग-अलग चरणों में ग्राउंड वेरिफिकेशन कराया है, जिसमें बारिश, मिट्टी की नमी और फसल की स्थिति जैसे वैज्ञानिक मानकों को शामिल किया गया है. इसलिए आने वाले दिनों में सूखा प्रभावित तालुकों की संख्या और नुकसान का सरकारी अनुमान दोनों बदल सकते हैं.
कर्नाटक में मानसून अब अपने आखिरी दौर में है. कुछ इलाकों में बारिश की वापसी जरूर हुई है, लेकिन सवाल ये है कि क्या देर से आई बारिश उस फसल को वापस ला पाएगी, जो समय पर बारिश न मिलने से बर्बाद हो चुकी है? क्योंकि किसान के लिए सूखा सिर्फ आसमान से गिरने वाली बारिश की कमी नहीं है.
सरकार के सामने कई सारी चुनौतियां हैं, राहत पहुंचाने की, विपक्ष के सवालों का जवाब देने की और केंद्र-राज्य के बीच अब आर्थिक मदद को लेकर खींचतान भी है. इस पूरी सियासत के बीच सबसे बड़ा इंतजार उस किसान को है, जिसे भाषण नहीं, अपने खेत और परिवार को बचाने के लिए समय पर मदद चाहिए.
