हरतालिका तीज व्रत: क्या जिंदगीभर करना होता है ये उपवास? जानें कब कर सकते हैं उद्यापन और क्या हैं नियम
September 12, 2026
हरतालिका तीज का व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन महिलाएं पति की लंबी उम्र, सुखी वैवाहिक जीवन और अखंड सौभाग्य की कामना से निर्जला व्रत रखती हैं। ऐसी मान्यताएं हैं कि इस व्रत का एक बार शुरू करने के बाद क्या इसे जीवनभर निभाना जरूरी है? अगर किसी वजह से आगे व्रत रखना संभव न हो तो इसका समापन कैसे किया जा सकता है? आइए जानते हैं हरतालिका तीज व्रत उद्यापन के क्या नियम बताए हैं।
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरतालिका तीज आती है। मान्यता है कि मां पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। इसी दौरान उन्होंने बालू से शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की पूजा की थी। प्रसन्न होकर शिवजी ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया। हरतालिका तीज दृढ़ संकल्प और अखंड सौभाग्य का प्रतीक है।
किसी बड़े व्रत का संकल्प भगवान को साक्षी मानकर लिया जाता है, इसलिए उसे अपनी इच्छा से बीच में छोड़ना उचित नहीं माना जाता। शास्त्रों के अनुसार, हरतालिका तीज व्रत को निर्जला रखने से शुभ परिणाम प्राप्त होते हैं। लेकिन हर व्यक्ति अपनी क्षमता और परिस्थितियों के अनुसार निर्जला या फलाहार व्रत का संकल्प ले सकता है।
एक बार हरतालिका तीज का संकल्प लेने के बाद इसे आजीवन करना चाहिए। वहीं, कुछ मान्यताओं के अनुसार, हरतालिका तीज व्रत का उद्यापन 13 साल पूरे करने के बाद किया जा सकता है। यानी 13 वर्ष के बाद विधि-विधान से इसका उद्यापन कर सकता है। अगर किसी महिला की उम्र अधिक हो गई हो या स्वास्थ्य संबंधी परेशानी के कारण व्रत करना संभव न रहे, तो इसका समापन किया जा सकता है।
वहीं, अगर कोई महिला शारीरिक असमर्थता के कारण व्रत नहीं रख सकती, तो बेटी या बहू या परिवार की कोई अन्य सुहागिन महिला इस परंपरा को आगे बढ़ा सकती है। हालांकि, यह व्यवस्था परिवार की मान्यता और परंपरा पर निर्भर करती है।
हरतालिका तीज का व्रत शुरू करने से पहले अपनी शारीरिक क्षमता और परिस्थितियों को जरूर ध्यान में रखना चाहिए। अगर बाद में किसी मजबूरी के कारण नियमों में बदलाव करना पड़े, तो अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार योग्य पंडित से सलाह लेना चाहिए।
