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लखनऊ: अहमामऊ में डग्गामारों की श्बारातश्, दावों की श्शहनाईश् और ट्रैफिक पुलिस का मौन व्रत


लखनऊ। राजधानी की सड़कों पर ट्रैफिक व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए डीसीपी ट्रैफिक रवीना त्यागी भले ही हर दिन पसीना बहा रही हों, लेकिन अहमामऊ चैराहे पर पहुँचते ही प्रशासन के सारे दावे दम तोड़ देते हैं। यहाँ ट्रैफिक चैकी से महज कुछ कदम की दूरी पर अवैध ई-रिक्शा, अर्टिगा और डग्गामार वाहनों की जो श्बारातश् सजती है, उसे देखकर लगता है कि असली श्राजश् पुलिस का नहीं, बल्कि इन डग्गामार चालकों का ही चल रहा है।

स्थानीय ट्रैफिक पुलिस का रटा-रटाया दावा है कि हर दिन ई-चालान और सीजर की सर्जिकल स्ट्राइक की जाती है। लेकिन साहब, सवाल बड़ा सीधा हैकृअगर कार्रवाई हर रोज हो रही है, तो फिर हर सुबह ये वाहन जमीन पर दोबारा कैसे उग आते हैं? क्या डग्गामार गाड़ियाँ किसी जादुई चिराग से निकलती हैं, या फिर यह एक दिन की कागजी कार्रवाई का ढिंढोरा पीटकर अगले दिन फिर श्पुराने ढर्रेश् पर लौटने की कोई कलाकारी है ?

अहमामऊ में लंबे समय से जमे टीएसआई और सहायक टीआई की श्निगहबानीश् के बावजूद हालात टस से मस नहीं हो रहे। अब जनता के मन में यह सवाल उठना वाजिब है कि क्या निचले कर्मचारियों का श्सिस्टमश् इतना मजबूत और असरदार हो चुका है कि आला अधिकारियों की सख्ती भी इसके सामने पानी भरती नजर आती है? या फिर श्अनदेखीश् करने की कोई खास वजह है, जो उच्च अधिकारियों को भी इस हकीकत का संज्ञान लेने से रोक रही है ?

अब देखना दिलचस्प होगा कि अहमामऊ की इस कड़वी हकीकत पर आला अधिकारी केवल दावों का मरहम लगाते हैं या फिर लंबे समय से कुंडली मारे बैठे जिम्मेदारों पर गाज गिराकर असली कार्रवाई का नजारा दिखाते हैं।

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