राम प्रकाश
जगदीशपुर/अमेठी। किसानों को राहत देने के लिए निजी नलकूपों के बिजली बिल माफ किए जाने की घोषणा भले ही सरकार की ओर से की गई हो, लेकिन जमीनी हकीकत में किसानों की परेशानी कम होने का नाम नहीं ले रही है। आरोप है कि निजी नलकूपों का बिल माफ होने के बावजूद कई किसानों से सिंचाई के नाम पर मनमाने तरीके से रकम वसूली जा रही है। इससे किसानों में नाराजगी बढ़ती जा रही है और जिम्मेदार विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं। किसानों का कहना है कि खेती पहले से ही महंगी होती जा रही है। डीजल, खाद, बीज, कीटनाशक और मजदूरी के बढ़ते खर्च के बीच सिंचाई भी किसानों की जेब पर अतिरिक्त बोझ बनती जा रही है। ऐसे में यदि निजी नलकूपों से सिंचाई करने के नाम पर अलग से मनमानी रकम वसूली जाती है तो सरकार की किसान हितैषी योजनाओं का लाभ आखिर किसे मिल रहा है, यह बड़ा सवाल है। किसानों का सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब निजी नलकूपों के बिजली बिल को लेकर सरकार ने राहत दी है तो फिर सिंचाई के नाम पर उनसे अतिरिक्त राशि क्यों ली जा रही है? ग्रामीण क्षेत्रों में कई किसान छोटे और सीमांत हैं। उनकी खेती पूरी तरह बारिश और निजी नलकूपों की सिंचाई व्यवस्था पर निर्भर रहती है। ऐसे किसानों से मनमानी सिंचाई शुल्क की वसूली उनके लिए आर्थिक संकट खड़ा कर सकती है। किसानों का आरोप है कि कई स्थानों पर सिंचाई के लिए निर्धारित व्यवस्था और शुल्क को लेकर स्पष्ट जानकारी भी उपलब्ध नहीं कराई जाती। खेत में पानी पहुंचाने के नाम पर अलग-अलग रकम मांगे जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं। इससे किसानों में भ्रम और असंतोष दोनों बढ़ रहा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि वसूली नियमों के अनुसार हो रही है तो किसानों को इसकी स्पष्ट जानकारी क्यों नहीं दी जा रही? और यदि किसी स्तर पर मनमानी वसूली हो रही है तो संबंधित जिम्मेदारों पर कार्रवाई कब होगी?। किसानों का कहना है कि उन्हें सरकार की योजनाओं का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब जमीनी स्तर पर उसकी निगरानी भी मजबूत हो। सिर्फ कागजों में बिल माफी और धरातल पर अतिरिक्त वसूली के आरोपों के बीच प्रशासन को मामले की निष्पक्ष जांच करानी चाहिए। किसानों की शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए संबंधित विभाग को गांव-गांव जांच करानी चाहिए। सिंचाई के नाम पर वसूली जाने वाली रकम, उसकी रसीद, निर्धारित दर और जिम्मेदार व्यक्ति की भूमिका की जांच हो तो स्थिति साफ हो सकती है। फिलहाल किसानों का कहना है कि उन्हें बिल माफी का वास्तविक लाभ चाहिए, न कि एक तरफ राहत और दूसरी तरफ सिंचाई के नाम पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ। अब देखना यह है कि जिम्मेदार विभाग किसानों की शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए जांच कराता है या फिर किसानों की जेब पर पड़ रहा यह कथित अतिरिक्त बोझ यूं ही जारी रहता है।
