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गम्भीर की कहानी गम्भीर की जुबानी! मिट्टी का बेटा – गंभीर सिंह की संघर्ष गाथा


उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के छोटे से गाँव कीरतपुर-नगीना की पावन मिट्टी में एक किसान परिवार में एक बालक का जन्म हुआ। उसका नाम था गंभीर सिंह।

उनके पिता एक साधारण किसान थे। उनका जीवन सूर्योदय से पहले खेतों में पहुँचने और सूर्यास्त के बाद घर लौटने की दिनचर्या पर आधारित था। समय पर वर्षा हो जाए तो घर में संतोष और समृद्धि का वातावरण रहता, अन्यथा पूरे वर्ष की मेहनत चिंता में बदल जाती।

गंभीर सिंह बचपन से ही अपने पिता के साथ खेतों में कार्य करता था। कभी बैलों के साथ हल चलाता, कभी धान की रोपाई में सहयोग करता, तो कभी गन्ने की कटाई में हाथ बँटाता। खेत की मिट्टी उसके पैरों से ही नहीं, बल्कि उसके सपनों से भी गहराई से जुड़ी हुई थी।

एक शाम उसके पिता ने थके हुए स्वर में कहा,
"बेटा, मैं चाहता हूँ कि तेरे हाथों में केवल हल ही नहीं, बल्कि कलम भी हो। किसान का बेटा किसान बने, इसमें कोई बुराई नहीं; लेकिन यदि तुम पढ़-लिखकर किसानों की आवाज़ बन सको, तो इससे बड़ा सौभाग्य और क्या होगा?"

ये शब्द गंभीर सिंह के जीवन का उद्देश्य बन गए। उसने निश्चय किया कि वह PCS अधिकारी बनेगा।

किन्तु मार्ग सरल नहीं था। परिवार की आर्थिक स्थिति अत्यंत कमजोर थी। कई बार फीस भरने के लिए पिता को अपनी उपज कम मूल्य पर बेचनी पड़ती थी। बिजली न होने पर वह लालटेन की रोशनी में अध्ययन करता था। सर्दियों की कठोर ठंड और गर्मियों की असहनीय उमस भी उसके संकल्प को डिगा नहीं सकीं।

लोग ताने देते,
"किसान का बेटा अफसर बनेगा? सपने भी अपनी सीमा में देखने चाहिए।"

गंभीर मुस्कुराकर उत्तर देता,
"सपनों की कोई जाति, कोई हैसियत और कोई सीमा नहीं होती। उन्हें केवल परिश्रम की आवश्यकता होती है।"

पहले प्रयास में वह असफल रहा। दूसरे प्रयास में भी सफलता नहीं मिली। अनेक लोगों ने सलाह दी कि अब पढ़ाई छोड़कर खेती संभाल ले।

एक दिन उसने अपने पिता से कहा,-"शायद मैं यह नहीं कर पाऊँगा।"

पिता ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा,
"बेटा, खेत में बोया गया हर बीज पहली बारिश में फसल नहीं बनता। कुछ बीज समय लेते हैं, लेकिन जब अंकुरित होते हैं, तो पूरा खेत हरियाली से भर देते हैं।"

यह वाक्य उसके जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा बन गया।

गंभीर सिंह ने और अधिक अनुशासन एवं समर्पण के साथ तैयारी प्रारंभ की। प्रत्येक असफलता को उसने अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि सीख के रूप में स्वीकार किया। वर्षों की कठोर साधना के पश्चात वह दिन आया जब उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (PCS) का परिणाम घोषित हुआ।

सूची में उसका नाम था—गंभीर सिंह।

उसने सर्वप्रथम अपने पिता के चरण स्पर्श किए। पिता की आँखों में आँसू थे। वे बोले,
"आज मेरी मेहनत नहीं, इस मिट्टी की जीत हुई है।"

गाँव की वही गलियाँ, जहाँ कभी उसके सपनों का उपहास किया जाता था, आज गर्व से उसका स्वागत कर रही थीं। बच्चे उसे देखकर कहते, "हम भी पढ़ेंगे... हम भी अपने गाँव का नाम रोशन करेंगे।"

गंभीर सिंह ने कभी अपनी जड़ों को नहीं छोड़ा। अधिकारी बनने के बाद भी वह प्रतिवर्ष अपने गाँव लौटता, खेत की मिट्टी को श्रद्धापूर्वक माथे से लगाता और किसानों के बीच बैठकर उनकी समस्याएँ सुनता।

उसका मानना था, जो अपनी मिट्टी को भूल जाता है, वह अपनी पहचान खो देता है।"

आज उसकी कहानी केवल एक किसान के बेटे के अधिकारी बनने की नहीं, बल्कि इस विश्वास की प्रतीक है कि संघर्ष चाहे कितना भी कठिन क्यों न हो, यदि इरादे दृढ़ हों और परिश्रम निरंतर हो, तो लक्ष्य एक दिन स्वयं मार्ग बनाकर सामने आ जाता है।

संदेश:

"गरीबी सपनों की बाधा नहीं होती, हार मान लेना बाधा होता है। किसान का बेटा जब संकल्प लेता है, तो वह खेत की मेड़ से उठकर इतिहास के पन्नों तक पहुँच सकता है।"

लेकिन नियति ने उसके जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा अभी बाकी रखी थी।

गंभीर सिंह सात भाई-बहनों वाले एक बड़े किसान परिवार से था। घर में अभाव इतने थे कि कई बार सभी भाई-बहनों को भरपेट भोजन भी नसीब नहीं होता था। माता-पिता अपने बच्चों के भविष्य के लिए स्वयं भूखे रह जाते, पर उनके चेहरे पर कभी शिकायत नहीं होती।

वर्षों के संघर्ष, असफलताओं और अथक परिश्रम के बाद जब गंभीर सिंह ने PCS अधिकारी बनने का अपना सपना पूरा किया, तब वह सफलता उसके जीवन की सबसे बड़ी खुशी तो थी, लेकिन उसी खुशी के साथ सबसे बड़ा दर्द भी जुड़ा था।

उस दिन जब नियुक्ति-पत्र उसके हाथ में था, तब उसके माता-पिता इस संसार में नहीं थे।

वह घर के उस आँगन में गया, जहाँ कभी उसकी माँ लालटेन की रोशनी में उसके लिए रोटियाँ बनाती थीं और पिता खेत से लौटकर कहते थे—"पढ़ बेटा... हमारी गरीबी यहीं खत्म होगी।" आज वही आँगन सूना था। उसने माता-पिता की तस्वीर के सामने नियुक्ति-पत्र रखा और आँसुओं से भरी आँखों से कहा

"आज मैं जीत गया हूँ... लेकिन यह जीत आपको दिखा न सका। मेरी सबसे बड़ी कमी यही रहेगी।"उस दिन उसने महसूस किया कि सफलता तभी पूर्ण होती है, जब उसे देखने के लिए माता-पिता की मुस्कान साथ हो। उनके बिना हर उपलब्धि अधूरी लगती है। लेकिन उसने अपने दुःख को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। उसने उसी क्षण एक नया संकल्प लिया—

"मेरे माता-पिता ने गरीबी में रहकर मुझे शिक्षा का महत्व सिखाया। अब मैं ऐसा समाज बनाना चाहता हूँ जहाँ किसी गरीब, किसान या मजदूर के बच्चे का सपना केवल पैसों की कमी से न टूटे।"

उसने अपने गाँव और आसपास के क्षेत्रों में निर्धन बच्चों की पढ़ाई के लिए पुस्तकें उपलब्ध कराना शुरू किया। आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों की फीस भरवाई, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं का मार्गदर्शन किया और हर मंच से शिक्षा का संदेश दिया।

वह अक्सर कहा करता था-

"किसी गरीब बच्चे को शिक्षा देना दान नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य में निवेश करना है। खेत में बोया गया बीज केवल किसान का नहीं होता, उसी तरह शिक्षित किया गया बच्चा केवल एक परिवार का नहीं, पूरे समाज का होता है।"

धीरे-धीरे उसके प्रयासों से अनेक किसान और मजदूर परिवारों के बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त करने लगे। किसी ने शिक्षक बनकर गाँव को रोशन किया, किसी ने पुलिस अधिकारी बनकर सेवा की, तो किसी ने डॉक्टर बनकर गरीबों का इलाज किया।

लोग अब उसे केवल PCS अधिकारी गंभीर सिंह के रूप में नहीं, बल्कि शिक्षा के माध्यम से समाज परिवर्तन का सपना देखने वाले एक कर्मयोगी के रूप में पहचानने लगे।
आज भी जब वह अपने गाँव कीरतपुर-नगीना, बिजनौर की मिट्टी को माथे से लगाता है, तो उसकी आँखों में अपने माता-पिता की याद और हृदय में एक ही संकल्प होता है—

"जब तक इस देश का अंतिम गरीब बच्चा शिक्षा से वंचित है, तब तक मेरी सफलता अधूरी है।"

संदेश:

"सच्ची सफलता वह नहीं जो केवल आपके जीवन को बदल दे; सच्ची सफलता वह है जो आपके कारण हजारों ज़िंदगियों में नई उम्मीद जगा दे। जो अपने संघर्ष को समाज की शक्ति बना दे, वही वास्तव में महान होता है।"

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