- पांच पन्नों के कथित सुसाइड नोट से मचा बवाल ,बहाली के नाम पर 23 लाख लेने और फिर 8 लाख की नई मांग का आरोप
- डीएम ने बैठाई जांच समिति, पुलिस करेगी बैंक खातों से लेकर कॉल डिटेल तक की पड़ताल
बीसलपुर। नगर पालिका के बर्खास्त कर संग्रहक उपेंद्र शंखधर की आत्महत्या अब महज एक आत्महत्या का मामला नहीं रह गई है। इस घटना ने नगर पालिका की कार्यप्रणाली, कथित भ्रष्टाचार, बहाली के नाम पर धन उगाही और मानसिक उत्पीड़न जैसे गंभीर सवालों को एक साथ खड़ा कर दिया है। पांच पन्नों के कथित सुसाइड नोट और मृतक के भाई अनुराग शर्मा की तहरीर के बाद कोतवाली बीसलपुर पुलिस ने नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी (ईओ), चेयरमैन प्रतिनिधि अमन जायसवाल उर्फ निक्की, बाबू अकरम खां, बाबू यासीन मोहम्मद और अकाउंटेंट संजीव मिश्रा के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की विभिन्न धाराओं में एफआईआर दर्ज कर ली है।इस पूरे घटनाक्रम ने जिले की राजनीति और प्रशासनिक हलकों में हलचल मचा दी है। सवाल उठ रहे हैं कि यदि बहाली के नाम पर लाखों रुपये की कथित वसूली की जा रही थी तो इसकी भनक जिम्मेदार अधिकारियों को क्यों नहीं लगी? क्या कोई बड़ा नेटवर्क काम कर रहा था या फिर यह किसी व्यक्ति विशेष की करतूत थी? इन सवालों के जवाब अब पुलिस विवेचना और प्रशासनिक जांच से ही सामने आएंगे।
मृतक द्वारा छोड़े गए पांच पन्नों के कथित सुसाइड नोट में ऐसे आरोप दर्ज हैं, जिन्होंने पूरे मामले को बेहद गंभीर बना दिया है। पत्र में दावा किया गया है कि नौकरी में बहाली और मुकदमे में राहत दिलाने के नाम पर पहले करीब 23 लाख रुपये लिए गए। नोट में यह भी उल्लेख है कि सितंबर और अक्टूबर 2025 में कुल 23 लाख रुपये नगर पालिका परिषद बीसलपुर से जुड़े एक बैंक खाते में जमा कराए गए। मृतक ने यह भी लिखा कि पैसा लेने के बाद भी बहाली नहीं हुई। उल्टा समय-समय पर नई रकम की मांग की जाती रही। आरोप है कि जब भाई ने इस बारे में सवाल उठाया तो उसके साथ अभद्रता और मारपीट तक की गई। यदि जांच में ये आरोप सही पाए जाते हैं तो मामला केवल आत्महत्या के लिए उकसाने का नहीं, बल्कि संगठित आर्थिक शोषण का भी बन सकता है।
परिजनों का कहना है कि उपेंद्र शंखधर ने नौकरी वापस पाने की उम्मीद में अपनी पत्नी के गहने गिरवी रख दिए, जमीन बेच दी और कर्ज लेकर भी रुपये जुटाए। परिवार को भरोसा दिलाया गया कि अधिकारियों तक पैसा पहुंचाकर बहाली करा दी जाएगी और मुकदमे में भी राहत मिल जाएगी। लेकिन समय गुजरता गया, पैसा खत्म होता गया और उम्मीद टूटती चली गई।
बताया गया कि 13 जुलाई को एक बार फिर आठ लाख रुपये की मांग की गई। परिजनों के मुताबिक उपेंद्र ने घर में कहा कि अब इतनी बड़ी रकम जुटाना उनके बस में नहीं है। इसी मानसिक तनाव के बीच उन्होंने फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली।
भाई अनुराग शर्मा की तहरीर पर पुलिस ने ईओ समेत पांच लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली है। मामला भारतीय न्याय संहिता की गंभीर धाराओं में दर्ज किया गया है। पुलिस अब कथित सुसाइड नोट की हैंडराइटिंग की वैज्ञानिक जांच, बैंक खातों के लेनदेन, मोबाइल कॉल डिटेल, चेक, दस्तावेज और संबंधित लोगों के बयान जुटाएगी। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि एफआईआर शिकायत और कथित सुसाइड नोट के आधार पर दर्ज की गई है। नोट में लगाए गए आरोपों की सत्यता की पुष्टि जांच के बाद ही होगी। यदि साक्ष्य आरोपों की पुष्टि करते हैं तो आगे और लोगों की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए जिलाधिकारी ज्ञानेंद्र सिंह ने तीन सदस्यीय जांच समिति गठित कर दी है। समिति विभागीय स्तर पर हुई कार्रवाई, कथित अनियमितताओं और पूरे घटनाक्रम की जांच करेगी। प्रशासन का कहना है कि दोषी चाहे कोई भी हो, जांच रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई की जाएगी।
क्या सचमुच नौकरी में बहाली के नाम पर लाखों रुपये का खेल चल रहा था? क्या एक बर्खास्त कर्मचारी को उम्मीद का झांसा देकर आर्थिक और मानसिक रूप से इतना तोड़ दिया गया कि उसने मौत को गले लगा लिया? या फिर कहानी का कोई दूसरा पक्ष भी सामने आएगा?इन सभी सवालों के जवाब फिलहाल जांच के गर्भ में हैं। इतना तय है कि बीसलपुर पालिका का यह मामला अब केवल एक आत्महत्या नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की पारदर्शिता और जवाबदेही की परीक्षा बन गया है। पुलिस की विवेचना, कथित सुसाइड नोट की फोरेंसिक जांच और डीएम की समिति की रिपोर्ट अब इस बहुचर्चित प्रकरण की दिशा तय करेगी।
