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नीट पर बवाल, पर महंगाई-बेरोजगारी पर क्यों नहीं उठता इतना बड़ा सवाल?


महंगाई, कर्ज और बेरोजगारी से बेहाल नब्बे प्रतिशत जनता को मलाल—सरकार बेपरवाह, विपक्ष भी राजनीतिक रोटियां सेंकने में लगा

नीट परीक्षा को लेकर देश की राजनीति, संसद और सड़कों पर मचा बवाल देखकर एक गंभीर सवाल मन में उठता है—काश, इतना ही बड़ा आंदोलन महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, महंगी शिक्षा, अस्पतालों की लूट और गांव-गरीब की बदहाली पर भी हुआ होता, तो शायद देश की नब्बे प्रतिशत जनता का कुछ भला हो जाता।

नीट में कथित अनियमितता, पेपर लीक या छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ निश्चित रूप से गंभीर विषय है। दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए और परीक्षा व्यवस्था पारदर्शी बननी चाहिए। लेकिन क्या देश में केवल वही बच्चे हैं जो नीट की तैयारी कर रहे हैं? उन करोड़ों बच्चों की चर्चा कौन करेगा, जो गरीबी, खराब सरकारी शिक्षा और पारिवारिक मजबूरियों के कारण हाईस्कूल तक भी नहीं पहुंच पाते?

नीट पर सरकार को घेरने वाले दलों से पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने कभी उन बच्चों के लिए संसद ठप की, जिनके माता-पिता स्कूल की फीस, किताब, ड्रेस और परीक्षा शुल्क तक नहीं जुटा पाते? क्या उन युवाओं के लिए भी कभी ऐसा बवाल हुआ, जो पढ़-लिखकर महानगरों में ₹10,000 से ₹15,000 महीने की नौकरी कर रहे हैं और किराया, भोजन तथा यात्रा का खर्च निकालने के बाद अपने माता-पिता को कुछ भेज तक नहीं पाते?

परीक्षा का सवाल जरूरी, लेकिन गरीबी की परीक्षा कौन समाप्त करेगा?

नीट की परीक्षा कुछ लाख छात्र देते हैं, लेकिन गरीबी की परीक्षा देश के करोड़ों परिवार प्रतिदिन देते हैं। गांव का मजदूर दिनभर पसीना बहाता है, तब भी महीने के अंत में ₹2,000, ₹3,000 या ₹4,000 से अधिक नहीं बचा पाता। परिवार में बीमारी आ जाए, बेटी की पढ़ाई हो, विवाह हो या कोई आकस्मिक संकट खड़ा हो जाए, तो उसकी पूरी अर्थव्यवस्था टूट जाती है।

दिल्ली, गुरुग्राम, मुंबई, नोएडा, बेंगलुरु और अन्य महानगरों में लाखों पढ़े-लिखे युवक रोजगार के नाम पर मामूली वेतन में काम कर रहे हैं। दस से बारह घंटे नौकरी करने के बावजूद उन्हें सम्मानजनक जीवन नहीं मिल पाता। किराया महंगा है, खाना महंगा है, परिवहन महंगा है और इलाज तो गरीब तथा निम्न मध्यम वर्ग की पहुंच से लगभग बाहर होता जा रहा है।

लेकिन इन युवाओं के नाम पर न संसद में वैसा हंगामा होता है, न सड़क पर लंबा आंदोलन और न राजनीतिक दलों में श्रेय लेने की ऐसी होड़ दिखाई देती है।

जनता बेहाल, सरकार अपने प्रचार में मालामाल

महंगाई ने आम परिवार की कमर तोड़ दी है। आटा, दाल, तेल, दूध, सब्जी, रसोई गैस, पेट्रोल, डीजल, दवा, फीस और बिजली—जीवन की हर जरूरत महंगी हो चुकी है। आय सीमित है, लेकिन खर्च लगातार बढ़ रहा है।

सरकार पांच किलो राशन देकर गरीब के कल्याण का ढिंढोरा पीटती है, जबकि उसी गरीब के बच्चे की शिक्षा, परिवार का इलाज, रोजी-रोटी और सम्मानजनक आवास की कोई स्थायी व्यवस्था नहीं है। क्या केवल राशन देना ही गरीबी का समाधान है? गरीब को दया नहीं, रोजगार चाहिए। उसे मुफ्त अनाज के साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सस्ता इलाज, सम्मानजनक वेतन और सामाजिक सुरक्षा चाहिए।

पांच किलो राशन देकर यह मान लेना कि गरीब की सभी समस्याएं समाप्त हो गईं, उसकी गरीबी और विवशता का राजनीतिक उपयोग करना है।

सरकारी स्कूलों की दुर्दशा, निजी स्कूलों की मनमानी

देश में उच्च शिक्षा की बड़ी-बड़ी बातें होती हैं, लेकिन प्राथमिक शिक्षा की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। अनेक सरकारी विद्यालयों में शिक्षक कम हैं, भवन खराब हैं, शौचालय और पीने के पानी की उचित व्यवस्था नहीं है तथा पढ़ाई का स्तर लगातार चिंता का विषय बना हुआ है।

दूसरी ओर निजी स्कूल फीस, किताब, ड्रेस, परिवहन और विभिन्न गतिविधियों के नाम पर अभिभावकों की जेब खाली कर रहे हैं। जो परिवार दो वक्त की रोटी मुश्किल से जुटाता है, वह अपने बच्चे को प्रतियोगी परीक्षा की महंगी कोचिंग कैसे दिलाएगा?

जब बुनियादी शिक्षा में ही असमानता होगी, तो नीट, जेईई या अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में समान अवसर का दावा कैसे किया जा सकता है? एक बच्चा वातानुकूलित कोचिंग संस्थान में लाखों रुपये खर्च करके तैयारी करता है और दूसरा बच्चा गांव के जर्जर सरकारी स्कूल में शिक्षक की प्रतीक्षा करता है। दोनों को एक ही परीक्षा में बैठाकर इसे समान प्रतियोगिता कहना न्याय नहीं है।

अस्पताल बने कमाई के केंद्र, इलाज से पहले जमा राशि की मांग

निजी अस्पतालों की मनमानी और महंगे इलाज ने गरीब तथा मध्यम वर्ग को आर्थिक बर्बादी के कगार पर पहुंचा दिया है। इलाज शुरू करने से पहले हजारों या लाखों रुपये जमा कराने की शर्त लगा दी जाती है। जांच, दवा, ऑपरेशन, कमरे और डॉक्टर की फीस के नाम पर परिवार की पूरी जमा-पूंजी समाप्त हो जाती है।

सरकारी अस्पतालों में भीड़, संसाधनों की कमी और लंबी प्रतीक्षा के कारण लोगों को मजबूरी में निजी अस्पतालों की ओर जाना पड़ता है। कई परिवार इलाज कराने के लिए जमीन, गहने और घर तक बेच देते हैं।

क्या कभी अस्पतालों की इस लूट पर वैसा राष्ट्रीय आंदोलन हुआ जैसा चुनावी लाभ देने वाले मुद्दों पर होता है? क्या संसद में इस बात पर लगातार बहस हुई कि गरीब को बिना पैसा जमा कराए तत्काल इलाज क्यों नहीं मिल सकता?

इथेनॉल से वाहन खराब होने की शिकायतें, जवाबदेही किसकी?

पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण को पर्यावरण और ऊर्जा आत्मनिर्भरता के नाम पर बढ़ावा दिया जा रहा है। नीति के संभावित लाभ अपनी जगह हैं, लेकिन वाहन मालिकों की शिकायतों को भी गंभीरता से लिया जाना चाहिए। पुराने वाहनों की अनुकूलता, माइलेज, इंजन पर प्रभाव और ईंधन की गुणवत्ता को लेकर लोगों में आशंका है।

सरकार को केवल नीति की सफलता का प्रचार नहीं करना चाहिए, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि उपभोक्ता को नुकसान न हो। किसी नीति से वाहन खराब होते हैं या रखरखाव का खर्च बढ़ता है, तो उसकी जिम्मेदारी उपभोक्ता पर डालकर सरकार मुक्त नहीं हो सकती।

हर परिवर्तन का वैज्ञानिक परीक्षण, पारदर्शी जानकारी और उपभोक्ता संरक्षण आवश्यक है।

सड़क बनते-बनते टूटती है, पुल गिरते हैं—फिर भी कोई जिम्मेदार नहीं

देश में सड़क, एक्सप्रेस-वे, पुल और एयरपोर्ट निर्माण को विकास के सबसे बड़े प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। निर्माण के उद्घाटन पर नेताओं के बड़े-बड़े फोटो लगते हैं, विज्ञापन छपते हैं और श्रेय लेने की होड़ मचती है।

लेकिन जब सड़क पहली बारिश में टूट जाए, पुल निर्माण के दौरान गिर जाए या उद्घाटन के कुछ समय बाद ही मरम्मत की जरूरत पड़ने लगे, तो जिम्मेदारी लेने वाला कोई नहीं मिलता।

जनता के टैक्स से बनी परियोजनाओं में घटिया सामग्री, भ्रष्टाचार, जल्दबाजी और तकनीकी लापरवाही के आरोप सामने आते रहते हैं। कई स्थानों पर निर्माणाधीन पुलों और संरचनाओं के गिरने से लोगों की जान भी जाती है। इसके बावजूद ठेकेदार, अधिकारी और राजनीतिक संरक्षण देने वालों पर कितनी कठोर कार्रवाई होती है?

किसी सड़क या पुल का निर्माण पूरा होना विकास नहीं है। उसका सुरक्षित, टिकाऊ और गुणवत्तापूर्ण होना वास्तविक विकास है।

योजना मायावती की, शुरुआत अखिलेश की, उद्घाटन भाजपा का!

उत्तर प्रदेश की राजनीति में विकास योजनाओं को लेकर श्रेय लेने का खेल पुराना है। कोई योजना एक सरकार के समय बनाई जाती है, दूसरी सरकार उसके निर्माण की शुरुआत करती है और तीसरी सरकार उसका उद्घाटन करके पूरी उपलब्धि अपने नाम कर लेती है।

कई परियोजनाओं पर बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी अपने-अपने दावे करती रही हैं। जनता को यह समझना होगा कि सड़क, अस्पताल, एयरपोर्ट और सरकारी भवन किसी दल या नेता के निजी पैसे से नहीं बनते। इनका निर्माण जनता के टैक्स और सरकारी संसाधनों से होता है।

नेताओं को श्रेय की लड़ाई छोड़कर यह बताना चाहिए कि परियोजना समय पर पूरी हुई या नहीं, लागत कितनी बढ़ी, गुणवत्ता कैसी रही और जनता को वास्तविक लाभ कितना मिला।

मौत पर धरना, हादसे पर राजनीति और चुनाव आते ही संवेदना

आज राजनीतिक दलों का चरित्र ऐसा बनता जा रहा है कि किसी बड़ी घटना, मौत, दुर्घटना या अन्याय के बाद नेताओं की भीड़ लग जाती है। सरकार के खिलाफ धरना दिया जाता है, प्रदर्शन होता है, फोटो खिंचते हैं, बयान जारी होते हैं और कुछ दिनों बाद मामला भुला दिया जाता है।

विपक्ष पीड़ित परिवार के आंसुओं में भी राजनीतिक अवसर खोजता है और सरकार आंदोलनकारियों को विपक्ष का एजेंट बताकर अपनी जिम्मेदारी से बचती है। दोनों पक्ष जनता के दर्द को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं।

यदि किसी मौत के बाद आंदोलन जरूरी है, तो मौत रोकने के लिए पहले से आंदोलन क्यों नहीं होता? यदि पुल गिरने के बाद आक्रोश जायज है, तो निर्माण में भ्रष्टाचार के दौरान विपक्ष कहां रहता है? यदि अस्पताल में मौत पर हंगामा होता है, तो महंगे इलाज और स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोरी पर लगातार जनांदोलन क्यों नहीं किया जाता?

कांग्रेस, सपा और बसपा भी जवाबदेही से बाहर नहीं

आज जो दल नीट और अन्य मुद्दों पर सरकार को घेर रहे हैं, वे भी लंबे समय तक सत्ता में रह चुके हैं। कांग्रेस ने देश पर दशकों शासन किया। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने उत्तर प्रदेश में कई बार सरकार बनाई। क्या उनके शासन में बेरोजगारी समाप्त हो गई थी? क्या सरकारी शिक्षा विश्वस्तरीय हो गई थी? क्या भ्रष्टाचार खत्म हो गया था? क्या निजी अस्पतालों और स्कूलों की मनमानी रुक गई थी?

सत्ता से बाहर होते ही गरीब, किसान, छात्र और बेरोजगार याद आने लगते हैं। सत्ता में आने के बाद वही दल नौकरशाही, ठेकेदारी और राजनीतिक समीकरणों में उलझ जाते हैं।

इसलिए नीट के नाम पर मचे राजनीतिक बवाल को केवल छात्र हित का आंदोलन मान लेना भूल होगी। इसमें छात्रों की चिंता हो सकती है, लेकिन चुनावी गणित, वोट बैंक और राजनीतिक अवसर भी शामिल हैं।

काश, महंगाई और बेरोजगारी पर भी संसद ठप होती

काश, विपक्ष ने महंगाई पर संसद ठप कर दी होती। काश, करोड़ों खाली सरकारी पदों पर भर्ती के लिए देशव्यापी आंदोलन किया होता। काश, आउटसोर्सिंग और संविदा व्यवस्था समाप्त कराने के लिए नेताओं ने सड़क से संसद तक संघर्ष किया होता।

काश, भ्रष्टाचार में डूबी परियोजनाओं, गिरते पुलों, टूटती सड़कों और महंगे इलाज पर राजनीतिक दल एकजुट होकर सरकार से जवाब मांगते। काश, सरकारी स्कूलों की दुर्दशा और निजी स्कूलों की लूट पर ऐसा ही राष्ट्रीय अभियान चलता।

तब गांव, गरीब, किसान, मजदूर, दस्तकार और बेरोजगार युवा भी महसूस करते कि राजनीति उनके लिए है।

आज स्थिति यह है कि जनता महंगाई, कर्ज और बेरोजगारी से हलाल है। उसे अपना पुरसाहाल पूछने वाला कोई दिखाई नहीं देता। सरकार उपलब्धियों के प्रचार में व्यस्त है और विपक्ष हर आपदा में चुनावी अवसर तलाश रहा है।

गरीब का कोई स्थायी सगा क्यों नहीं?

गरीब चुनाव के समय हर पार्टी का मालिक कहलाता है, लेकिन चुनाव के बाद वही गरीब सरकारी दफ्तर, अस्पताल, थाने, तहसील और रोजगार कार्यालय के चक्कर लगाता रहता है। उसकी मजदूरी कम है, खर्च अधिक है और भविष्य असुरक्षित है।

राजनीतिक दल जाति, धर्म, आरक्षण, मंदिर, मस्जिद और भावनात्मक मुद्दों पर समाज को बांटते हैं, लेकिन महंगाई और बेरोजगारी से पीड़ित सभी जातियों और धर्मों के गरीबों को एकजुट नहीं होने देते।

क्योंकि जिस दिन गरीब, मजदूर, किसान, दस्तकार और बेरोजगार युवा अपने असली मुद्दों पर एकजुट हो गए, उस दिन चुनावी नारों और झूठे वादों की राजनीति कमजोर पड़ जाएगी।

नीट का न्याय हो, लेकिन देश की नब्बे प्रतिशत जनता को मत भूलिए

नीट परीक्षा से जुड़े प्रत्येक आरोप की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। छात्रों के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए। दोषियों पर कठोर कार्रवाई हो और परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी बनाया जाए।

लेकिन इसके साथ ही देश उन करोड़ों बच्चों को न भूले, जो नीट तक पहुंचने का सपना भी नहीं देख पाते। उनके लिए अच्छी सरकारी शिक्षा, निशुल्क कोचिंग, छात्रावास, भोजन, किताब और आर्थिक सहायता की व्यवस्था होनी चाहिए।

देश का राजनीतिक विमर्श केवल उन छात्रों तक सीमित नहीं हो सकता जिनकी आवाज मीडिया और बड़े शहरों तक पहुंचती है। उस गरीब बच्चे की आवाज भी सुनी जानी चाहिए, जो स्कूल छोड़कर दुकान, खेत, फैक्ट्री या निर्माण स्थल पर मजदूरी करने को मजबूर है।

नीट पर बवाल जरूरी हो सकता है, लेकिन महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, शिक्षा, स्वास्थ्य और किसानों की बदहाली पर राष्ट्रीय मौन किसी बड़े अन्याय से कम नहीं है।

सरकार को प्रचार छोड़कर जवाब देना होगा और विपक्ष को राजनीतिक रोटियां सेंकने के बजाय गरीब की स्थायी लड़ाई लड़नी होगी। अन्यथा जनता को यह कहने का पूरा अधिकार है—

महंगाई, कर्ज और बेरोजगारी से हलाल,

  • नब्बे प्रतिशत जनता को मलाल।
  • हमारा नहीं कोई पुरसाहाल,
  • सरकार बेपरवाह—विपक्ष भी वोटों का दलाल।

लेखक: विनेश ठाकुर ‘कर्पूरी’

सम्पादक, विधान केसरी, लखनऊ

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