महिला सुरक्षा के दावों पर उठे सवाल, मेडिकल कॉलेज की सुरक्षा व्यवस्था कठघरे में! न्याय और जवाबदेही की मांग तेज
पीलीभीत। राजकीय मेडिकल कॉलेज परिसर में पैरामेडिकल छात्रा कशिश पटेल की चाकू मारकर की गई हत्या ने पूरे जनपद को झकझोर कर रख दिया है। इस दर्दनाक घटना के बाद जहां एक ओर छात्र-छात्राओं, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों में भारी आक्रोश देखने को मिल रहा है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय जनप्रतिनिधियों की कथित चुप्पी भी चर्चा का विषय बन गई है। क्षेत्रीय विधायक, सांसद और सरकार में प्रतिनिधित्व करने वाले नेताओं की ओर से अब तक सार्वजनिक रूप से कोई स्पष्ट और प्रभावी प्रतिक्रिया सामने न आने पर लोगों में नाराजगी लगातार बढ़ रही है।
घटना ने एक बार फिर महिला सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और सरकारी संस्थानों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस मेडिकल कॉलेज को सुरक्षित शिक्षण और उपचार का केंद्र माना जाता है, उसी परिसर के भीतर एक छात्रा पर धारदार हथियार से जानलेवा हमला होना सुरक्षा व्यवस्था की बड़ी विफलता के रूप में देखा जा रहा है। लोगों का कहना है कि यदि मेडिकल कॉलेज जैसा संवेदनशील परिसर सुरक्षित नहीं है तो अन्य सार्वजनिक स्थलों पर महिलाओं और छात्राओं की सुरक्षा का अंदाजा सहज लगाया जा सकता है।
घटना के बाद शासन और प्रशासन की ओर से आरोपी की गिरफ्तारी, जांच और कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है, लेकिन जनमानस का कहना है कि केवल कानूनी कार्रवाई ही पर्याप्त नहीं है। सुरक्षा व्यवस्था में हुई चूक की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। लोगों का सवाल है कि आरोपी धारदार हथियार लेकर कॉलेज परिसर तक कैसे पहुंच गया? सुरक्षा जांच व्यवस्था कहां थी? परिसर में तैनात सुरक्षा कर्मियों की भूमिका क्या रही? इन सभी बिंदुओं की निष्पक्ष जांच की मांग लगातार उठ रही है।
सबसे अधिक चर्चा स्थानीय जनप्रतिनिधियों की कथित चुप्पी को लेकर हो रही है। आम नागरिकों का कहना है कि चुनावी सभाओं और सरकारी कार्यक्रमों में महिला सुरक्षा को प्रमुख मुद्दा बनाया जाता है, लेकिन जब किसी बेटी की निर्मम हत्या हो जाती है तो जनप्रतिनिधियों की ओर से अपेक्षित संवेदनशीलता दिखाई नहीं देती। लोगों का मानना है कि ऐसे मामलों में केवल प्रशासनिक कार्रवाई ही नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों का पीड़ित परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त करना, उन्हें न्याय का भरोसा दिलाना और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग करना भी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी का हिस्सा है।
घटना के बाद सोशल मीडिया पर भी लोगों का गुस्सा लगातार सामने आ रहा है। कई लोगों ने सवाल उठाए हैं कि क्या ष्बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओष् जैसे अभियान केवल सरकारी विज्ञापनों और नारों तक सीमित रह गए हैं? यदि शिक्षण संस्थानों में भी छात्राएं सुरक्षित नहीं हैं तो महिला सुरक्षा के दावों का वास्तविक मूल्यांकन किया जाना चाहिए।सामाजिक संगठनों और छात्र संगठनों ने भी इस मामले में निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए कहा है कि मेडिकल कॉलेज परिसर की सुरक्षा व्यवस्था की उच्चस्तरीय जांच कर दोषी अधिकारियों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए। उनका कहना है कि यदि सुरक्षा में लापरवाही सामने आती है तो केवल आरोपी को सजा देना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।कानून-व्यवस्था को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं। लोगों का कहना है कि अपराधियों में कानून का भय कम होता दिखाई दे रहा है। यदि सरकारी संस्थानों के भीतर इस प्रकार की घटनाएं होंगी तो आम जनता का सुरक्षा व्यवस्था पर विश्वास कमजोर होगा। ऐसे में पुलिस और प्रशासन के लिए यह मामला केवल एक हत्या की जांच तक सीमित नहीं है, बल्कि जनता के विश्वास को दोबारा मजबूत करने की भी बड़ी चुनौती है।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की घटनाओं पर सभी दलों और जनप्रतिनिधियों को राजनीति से ऊपर उठकर संवेदनशीलता दिखानी चाहिए। पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने, सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने और भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए ठोस कदम उठाना समय की आवश्यकता है।फिलहाल पूरा जनपद इस दर्दनाक घटना से स्तब्ध है। छात्र-छात्राओं, अभिभावकों और आम नागरिकों की निगाहें अब प्रशासनिक जांच, न्यायिक प्रक्रिया और जनप्रतिनिधियों की आगामी प्रतिक्रिया पर टिकी हैं। लोगों की मांग है कि इस मामले में त्वरित, निष्पक्ष और पारदर्शी कार्रवाई करते हुए न केवल आरोपी को कठोर दंड दिलाया जाए, बल्कि सुरक्षा व्यवस्था में हुई किसी भी लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी सुनिश्चित की जाए, ताकि भविष्य में किसी अन्य परिवार को ऐसी त्रासदी का सामना न करना पड़े।
