- उपेंद्र शंखधार आत्महत्या प्रकरण में चेयरमैन पति, तत्कालीन ईओ समेत पांच पर मुकदमा दर्ज
- कई दिन बाद भी कार्रवाई शून्यय निष्पक्ष जांच पर उठने लगे सवाल
पीलीभीत। बीसलपुर नगर पालिका परिषद के बर्खास्त कर्मचारी उपेंद्र शंखधार की आत्महत्या का मामला अब केवल एक आत्महत्या की जांच तक सीमित नहीं रह गया है। यह प्रकरण अब पुलिस की कार्यशैली, प्रशासनिक जवाबदेही और प्रभावशाली लोगों के खिलाफ कानून के समान अनुपालन को लेकर गंभीर सवालों के केंद्र में आ गया है। पूर्व मंत्री के हस्तक्षेप के बाद चेयरमैन पति अमन जायसवाल निक्की, तत्कालीन अधिशासी अधिकारी (ईओ) समेत पांच लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज होने के बावजूद कई दिन बीत जाने के बाद भी किसी आरोपी की गिरफ्तारी न होना चर्चा और विवाद का विषय बना हुआ है।शहर में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि जब पुलिस स्वयं एफआईआर दर्ज कर चुकी है तो आखिर कार्रवाई की रफ्तार इतनी धीमी क्यों है? क्या विवेचना के नाम पर गिरफ्तारी टाली जा रही है, या फिर प्रभावशाली लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने में पुलिस असहज नजर आ रही है? आम लोगों के बीच यह धारणा तेजी से बन रही है कि कानून का व्यवहार सभी के लिए समान नहीं दिखाई दे रहा।सूत्रों के अनुसार, चेयरमैन पति अमन जायसवाल निक्की के खिलाफ पूर्व में भी विभिन्न मामलों में मुकदमे दर्ज होने की चर्चाएं रही हैं। हालांकि उन मामलों में न्यायालय द्वारा क्या निर्णय दिया गया या दोषसिद्धि हुई है अथवा नहीं, इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं है। फिर भी स्थानीय स्तर पर यह सवाल लगातार उठ रहा है कि यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ पहले भी आपराधिक प्रकरण दर्ज रहे हों और अब एक आत्महत्या के गंभीर मामले में भी एफआईआर दर्ज हो चुकी हो, तो पुलिस कार्रवाई में इतनी सुस्ती क्यों दिखाई दे रही है? उपेंद्र शंखधार की आत्महत्या के बाद उनके परिजनों ने लगातार आरोप लगाया कि उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया, जिसके कारण उन्होंने यह कदम उठाया। परिवार के विरोध और मामले के तूल पकड़ने के बाद पूर्व मंत्री के हस्तक्षेप पर पुलिस ने चेयरमैन पति, तत्कालीन ईओ सहित पांच लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। एफआईआर दर्ज होने के बाद परिजनों को उम्मीद थी कि पुलिस शीघ्र आरोपियों से पूछताछ कर कानूनी कार्रवाई करेगी, लेकिन कई दिन बीत जाने के बाद भी कोई गिरफ्तारी न होने से परिवार की नाराजगी लगातार बढ़ रही है।मामले ने अब राजनीतिक रंग भी लेना शुरू कर दिया है। विपक्षी दलों और विभिन्न सामाजिक संगठनों का आरोप है कि यदि यही आरोप किसी सामान्य नागरिक पर लगे होते तो पुलिस अब तक गिरफ्तारी कर जेल भेज चुकी होती। ऐसे में प्रभावशाली लोगों के मामलों में कार्रवाई की धीमी गति पुलिस की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर रही है। लोगों का कहना है कि कानून का डर तभी कायम रहेगा, जब कार्रवाई बिना भेदभाव और बिना दबाव के होती दिखाई दे।हालांकि पुलिस अधिकारियों का कहना है कि पूरे मामले की विवेचना निष्पक्ष तरीके से की जा रही है और साक्ष्यों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी। लेकिन यह भी सच है कि जैसे-जैसे समय बीत रहा है, वैसे-वैसे जनता के मन में संदेह गहराता जा रहा है। शहर में अब यही चर्चा है कि क्या इस मामले में भी जांच लंबी खिंचती रहेगी या फिर पुलिस जल्द निष्पक्ष कार्रवाई कर कानून के प्रति लोगों का विश्वास कायम करेगी।उपेंद्र शंखधार की मौत केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि व्यवस्था की संवेदनशीलता की भी परीक्षा बन चुकी है। अब सबकी निगाहें पुलिस की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।
