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श्रेय और वोट लेने वाले नेताओं की पोल खुली छात्रों की हुई जीत! अनशनकारियों का भरोसा बचा; सरकार भी अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती


लोकतंत्र में छात्र आंदोलन व्यवस्था को जगाने का सशक्त माध्यम है। जब सरकार समय रहते समस्याओं को नहीं सुनती, तब असंतोष सड़कों पर उतरता है। हालिया आंदोलन में भी यही हुआ। छात्रों ने अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया, अनशनकारियों ने धैर्य दिखाया और अंततः सरकार को बातचीत तथा समझौते की दिशा में बढ़ना पड़ा। यह किसी राजनीतिक दल की नहीं, बल्कि छात्रों की जीत है।

इस घटनाक्रम ने उन नेताओं की पोल भी खोल दी, जो आंदोलनकारियों के दर्द से अधिक श्रेय और वोट की चिंता कर रहे थे। उन्हें उम्मीद थी कि आंदोलन लंबा चलेगा, टकराव बढ़ेगा और सरकार के विरुद्ध बड़ा राजनीतिक वातावरण तैयार होगा। लेकिन समाधान होते ही उनकी रणनीति धराशायी हो गई।

पीड़ितों के बीच नेताओं का पहुंचना गलत नहीं है। विपक्ष का दायित्व है कि वह अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाए। लेकिन जब कैमरे, भाषण, दलों के झंडे और श्रेय लेने की होड़ आंदोलन की मूल मांगों पर हावी हो जाए, तब नेताओं की मौजूदगी पीड़ित पक्ष के लिए अभिशाप बन जाती है। छात्र न्याय मांगते हैं, उन्हें राजनीतिक दलों की चुनावी सीढ़ी नहीं बनना चाहिए।

सत्ता भी कम गुनहगार नहीं

पूरी जिम्मेदारी विपक्ष पर डालकर सरकार स्वयं को निर्दोष नहीं बता सकती। यदि छात्रों की मांगें शुरुआत में सुन ली जातीं, तो आंदोलन इतना बड़ा नहीं होता। न पुलिस कार्रवाई की आवश्यकता पड़ती और न हजारों छात्रों पर मुकदमों की तलवार लटकती।

खराब व्यवस्था को स्वीकार करना सरकार की कमजोरी नहीं, बल्कि समझदारी है। हर शिकायत को षड्यंत्र और हर आंदोलनकारी को विरोधी मानना लोकतांत्रिक सरकार का व्यवहार नहीं हो सकता। समझौते में देरी सभी के लिए अभिशाप बनती है—छात्रों की पढ़ाई प्रभावित होती है, प्रशासन पर दबाव बढ़ता है और राजनीतिक रोटियां सेंकने वालों को अवसर मिलता है।

सरकार को यह भी समझना होगा कि जनता का भरोसा केवल विज्ञापनों और प्रचार से नहीं मिलता। स्थिति यहां तक पहुंच जाए कि लोग सरकार के बजाय किसी व्यंग्यात्मक प्रतीक या ‘कॉकरोच’ के साथ खड़ा होना पसंद करें, तो यह गंभीर जन-अविश्वास का संकेत है। ऐसे संदेश पर नाराज होने के बजाय आत्ममंथन करना चाहिए।

हजारों छात्रों पर मुकदमे क्यों?

हिंसा, तोड़फोड़ या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन केवल शांतिपूर्ण प्रदर्शन, नारेबाजी या आंदोलन में शामिल होने के कारण छात्रों का भविष्य खराब करना न्यायसंगत नहीं है।

सरकार को निर्दोष और शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों पर दर्ज मुकदमों की तत्काल समीक्षा करनी चाहिए। जिन युवाओं को परीक्षा और रोजगार की तैयारी करनी चाहिए, उन्हें अदालतों और थानों के चक्कर लगाने के लिए मजबूर करना व्यवस्था की सफलता नहीं, विफलता है।

भविष्य में नेताओं की एंट्री बंद करें आंदोलनकारी

इस आंदोलन से आंदोलनकारियों को भी बड़ा सबक लेना चाहिए। भविष्य में किसी भी छात्र, युवा या जनआंदोलन के मंच पर राजनीतिक नेताओं की अनियंत्रित एंट्री बंद की जानी चाहिए। नेता समर्थन देना चाहें तो बाहर से दें, संसद और विधानसभा में सवाल उठाएं, कानूनी सहायता उपलब्ध कराएं और सरकार पर संवैधानिक दबाव बनाएं, लेकिन आंदोलन का मंच अपने कब्जे में न लें।

आंदोलन की कमान छात्रों, अभिभावकों, शिक्षकों और वास्तविक पीड़ितों के हाथ में ही रहनी चाहिए। मंच पर पार्टी के झंडे, चुनावी भाषण और श्रेय लेने की होड़ शुरू होते ही आंदोलन की निष्पक्षता और विश्वसनीयता कमजोर पड़ जाती है। आंदोलनकारी पहले से स्पष्ट नियम बनाएं कि कोई भी नेता मंच से भाषण नहीं देगा, दल का झंडा नहीं लगेगा और आंदोलन को किसी पार्टी के पक्ष या विपक्ष में नहीं मोड़ा जाएगा।

समर्थन स्वीकार किया जा सकता है, राजनीतिक कब्जा नहीं।

इस पूरे घटनाक्रम का स्पष्ट निष्कर्ष है—जीत छात्रों की हुई, अनशनकारियों का भरोसा बचा और श्रेय व वोट के भूखे नेताओं का सपना टूट गया। लेकिन सरकार की जिम्मेदारी अभी समाप्त नहीं हुई है। समझौते को ईमानदारी से लागू करना, व्यवस्था में सुधार करना और निर्दोष छात्रों के मुकदमे वापस लेना आवश्यक है।

सत्ता को सुनना सीखना होगा, विपक्ष को आंदोलन पर राजनीति करना छोड़ना होगा और आंदोलनकारियों को अपने मंच की मर्यादा तथा स्वतंत्रता की रक्षा करनी होगी। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब समाधान को श्रेय से और जनहित को वोट की राजनीति से ऊपर रखा जाएगा।

 लेखक: विनेश ठाकुर ‘कर्पूरी’

सम्पादक, विधान केसरी, लखनऊ

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