हाँ, मैं पत्रकार हूँ-मेरे हाथ में कलम है, गले में प्रेस का कार्ड है, जेब में खाली पर्स है और सिर पर जिम्मेदारियों का पहाड़ है। अब समस्या केवल इतनी है कि मुझे पत्रकारिता करनी है या किसी की नौकरी बजानी है—सरकार की गुलामी, मालिक की जी-हुजूरी, विज्ञापनदाता की चापलूसी या फिर जनता के दर्द की कहानी?
वैसे पत्रकारिता की किताबें कहती हैं कि पत्रकार निष्पक्ष होता है। वह न सत्ता का होता है, न विपक्ष का। वह केवल सच का होता है। लेकिन किताब लिखने वालों ने शायद यह नहीं बताया कि सच का राशन कार्ड कहां बनता है, सच से बच्चों की फीस कैसे जमा होती है और निष्पक्षता से अस्पताल का बिल कौन चुकाता है।
मैं सरकार की प्रशंसा करूं तो समझदार पत्रकार कहलाता हूँ। सवाल पूछ दूं तो विपक्ष का एजेंट। विपक्ष की गलती लिखूं तो सत्ता का दलाल और सत्ता की कमजोरी दिखा दूं तो देशविरोधी। दोनों को बराबर आईना दिखाऊं तो दोनों मिलकर कहते हैं—यह पत्रकार किसी काम का नहीं है।
आज पत्रकार से सबसे पहले यह नहीं पूछा जाता कि खबर सच्ची है या नहीं। पूछा जाता है—खबर किसके पक्ष में है?
सत्ता चाहती है कि पत्रकार हर घोषणा को ऐतिहासिक बताए। सड़क में गड्ढे हों तो विकास की गहराई लिखे। अस्पताल में दवा न हो तो डिजिटल स्वास्थ्य क्रांति बताए। बेरोजगार युवक लाइन में खड़ा हो तो उसे रोजगार मेले की सफलता घोषित करे। महंगाई बढ़े तो अर्थव्यवस्था की मजबूती बताए और जनता कराहे तो लिखे—देश खुशहाल है।
मालिक चाहता है कि खबर वही छपे जिससे विज्ञापन न रुके। पत्रकार की कलम भले रुक जाए, लेकिन विज्ञापनदाता नाराज नहीं होना चाहिए। अखबार का पन्ना जनता के लिए निकले या बाजार के लिए, इसका फैसला संपादकीय कक्ष में कम और हिसाब-किताब की मेज पर अधिक होता है।
बड़े-बड़े संस्थानों में पत्रकार को स्वतंत्रता अवश्य मिलती है—बस उतनी, जितनी मालिक की अनुमति हो। उसे सच बोलने की पूरी आजादी है, बशर्ते उस सच से सरकार, उद्योगपति, विज्ञापनदाता, चैनल मालिक और राजनीतिक संरक्षक किसी को परेशानी न हो।
जनता भी कम अद्भुत नहीं है। वह कहती है—
मीडिया बिक गया है। लेकिन वही जनता गंभीर समाचार छोड़कर चीख-पुकार, सनसनी, विवाद, नाच-गाना और अफवाह सबसे पहले देखती है। किसान की समस्या पर दस मिनट का कार्यक्रम हो तो चैनल बदल जाता है। किसी नेता ने किसे क्या कह दिया, इस पर दो घंटे की बहस हो तो टीआरपी आसमान छूने लगती है।
फिर कहा जाता है कि मीडिया जनता के मुद्दे नहीं दिखाता। मीडिया दिखाए भी तो कौन देखे?
जरूरतमंद व्यक्ति पत्रकार के पास आता है। कहता है—भैया, हमारा दर्द छाप दो। उसकी पीड़ा लिख दी जाए तो अधिकारी नाराज। अधिकारी का पक्ष लिया जाए तो पीड़ित नाराज। दोनों पक्ष लिख दिए जाएं तो पाठक कहता है—आपने फैसला क्यों नहीं सुनाया?
पत्रकार अब संवाददाता कम और चलता-फिरता थाना, अदालत, जांच आयोग, रोजगार कार्यालय तथा जनसुनवाई केंद्र अधिक समझा जाने लगा है। लोगों को लगता है कि प्रेस कार्ड दिखाते ही सड़क बन जाएगी, मुकदमा दर्ज हो जाएगा, अधिकारी निलंबित हो जाएगा और सरकार आदेश जारी कर देगी। ऐसा न होने पर दोष पत्रकार का—“आपकी कोई सुनता ही नहीं है।”
सच यह है कि आज छोटे और मध्यम समाचार संस्थानों में काम करने वाला पत्रकार स्वयं सबसे बड़ा जरूरतमंद है। वह दूसरों की समस्याएं उठाता है, लेकिन उसकी समस्या उठाने वाला कोई नहीं। वह मजदूर की मजदूरी लिखता है, पर अपना मानदेय महीनों नहीं पाता। वह कर्मचारियों के अधिकारों पर समाचार छापता है, लेकिन उसके पास नियुक्ति पत्र तक नहीं होता। वह अस्पताल की अव्यवस्था दिखाता है, पर बीमार पड़ने पर इलाज के लिए उधार मांगता है।
पत्रकार की स्थिति उस चौकीदार जैसी हो गई है, जिसे पूरी रात समाज की रक्षा करनी है, लेकिन उसके अपने घर का दरवाजा टूटा हुआ है।
ऊपर से निष्पक्षता का बोझ। निष्पक्षता आज ऐसी रस्सी है, जिस पर पत्रकार को आंखों पर पट्टी बांधकर चलना है। दाईं ओर सत्ता खड़ी है, बाईं ओर विपक्ष और नीचे सोशल मीडिया की भीड़। जरा-सा संतुलन बिगड़ा नहीं कि हर तरफ से प्रमाणपत्र मिलने लगते हैं—दलाल, एजेंट, गोदी मीडिया, बिकाऊ मीडिया, अराजक, राष्ट्रविरोधी और न जाने क्या-क्या।
सवाल पूछना पत्रकार का धर्म है, लेकिन आज सवाल पूछने से पहले उसे प्रश्न का राजनीतिक गोत्र देखना पड़ता है। सवाल सरकार से हो तो विपक्ष खुश, सवाल विपक्ष से हो तो सरकार खुश। जनता से सवाल करो तो जनता कहती है—हमें उपदेश मत दो।
ऐसे में पत्रकार आखिर करे तो क्या करे?
सरकार की गुलामी करे तो कलम मरती है। मालिक की जी-हुजूरी करे तो आत्मसम्मान मरता है। केवल टीआरपी के पीछे भागे तो समाज मरता है और पूरी सच्चाई लिख दे तो पत्रकार स्वयं संकट में पड़ जाता है।
फिर भी पत्रकारिता समाप्त नहीं हुई है। अभी भी गांवों, कस्बों और छोटे शहरों में हजारों पत्रकार बिना पर्याप्त वेतन, सुरक्षा और संसाधनों के जनता की आवाज उठा रहे हैं। वे दुर्घटनास्थल पर पुलिस से पहले पहुंचते हैं, बाढ़ में नाव पर चढ़ते हैं, दंगों में पत्थर खाते हैं, महामारी में संक्रमित होते हैं और भ्रष्टाचार उजागर करने पर मुकदमे झेलते हैं।
उनके पास बड़े स्टूडियो नहीं, लेकिन जमीन की सच्चाई है। उनके पास भारी वेतन नहीं, लेकिन समाज की चिंता है। उनके पास सुरक्षा नहीं, लेकिन सवाल पूछने का साहस है।
पत्रकारिता का संकट केवल पत्रकार का संकट नहीं है। जिस समाज में पत्रकार सवाल पूछना छोड़ देता है, वहां सत्ता जवाब देना छोड़ देती है। जिस देश में खबर विज्ञापन और प्रचार में बदल जाती है, वहां लोकतंत्र धीरे-धीरे दर्शक बन जाता है।
इसलिए पत्रकार से निष्पक्षता मांगने से पहले उसे स्वतंत्रता, सुरक्षा और सम्मान भी देना होगा। सरकार को आलोचना सहनी होगी, मालिक को संपादकीय स्वतंत्रता देनी होगी और जनता को सनसनी के बजाय सार्थक पत्रकारिता का साथ देना होगा।
मैं पत्रकार हूँ। न मैं सरकार का नौकर हूँ, न विपक्ष का प्रवक्ता, न मालिक का घरेलू सेवक और न भीड़ का मनोरंजनकर्ता। मेरा काम सत्ता से सवाल पूछना, जरूरतमंद का दर्द सामने लाना और जनता को सच बताना है।
- हां, इस रास्ते में खतरे हैं। मुकदमे हैं, धमकियां हैं, आर्थिक तंगी है और अपमान भी है। फिर भी कलम चलानी होगी।
- क्योंकि पत्रकार यदि जी-हुजूरी करने लगे, तो समाचार मर जाता है।
- पत्रकार यदि डरकर चुप हो जाए, तो जनता की आवाज मर जाती है।
- और पत्रकार यदि सच लिखना छोड़ दे, तो लोकतंत्र केवल चुनाव का उत्सव बनकर रह जाता है।
इसलिए मेरा जवाब स्पष्ट है—
- मैं किसी की गुलामी नहीं करूंगा।
- मैं किसी की जी-हुजूरी नहीं करूंगा।
- मैं जनता का दर्द लिखूंगा, सत्ता से सवाल करूंगा और जहां तक संभव होगा, सच के साथ खड़ा रहूंगा।
बाकी सरकार मुझे विरोधी माने, विपक्ष मुझे पक्षपाती कहे, मालिक मुझे जिद्दी समझे और जनता कहे कि मेरी कोई नहीं सुनता—फिर भी मैं लिखूंगा।
क्योंकि हाँ, मैं पत्रकार हूँ।
लेखक: विनेश ठाकुर
सम्पादक, विधान केसरी, लखनऊ
