रूद्रपुर। दिल्ली के कनॉट प्लेस के समीप स्थित जंतर-मंतर कभी खगोलीय अध्ययन का केंद्र था। वर्ष 1724 में महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने इसे ग्रह-नक्षत्रों की गति मापने और खगोल विज्ञान के अध्ययन के उद्देश्य से बनवाया था। समय के साथ इसका स्वरूप बदलता गया। आज जंतर-मंतर केवल एक ऐतिहासिक धरोहर नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण विरोध का एक महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है।
यह वही स्थान है जहाँ वर्षों से विभिन्न वर्गोंकृछात्रों, किसानों, कर्मचारियों, महिलाओं, सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलोंकृने अपनी मांगों और अधिकारों की आवाज बुलंद की है। इस दृष्टि से जंतर-मंतर केवल पत्थरों का स्मारक नहीं, बल्कि लोकतंत्र की जीवंत चेतना का प्रतीक बन चुका है।
भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में अनेक बड़े आंदोलनों ने सत्ता को सोचने और निर्णय बदलने के लिए मजबूर किया है। निर्भया आंदोलन, भ्रष्टाचार विरोधी जन आंदोलन, किसानों के आंदोलन और अनेक सामाजिक अभियानों ने यह संदेश दिया कि लोकतंत्र में जनता की आवाज को हमेशा महत्व देना पड़ता है। जंतर-मंतर ने वर्षों से यही भूमिका निभाई हैकृसवाल पूछने की, संवाद की और लोकतांत्रिक असहमति की।
आज देश के अनेक युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता को लेकर चिंतित हैं। उनका कहना है कि बार-बार सामने आने वाले पेपर लीक और परीक्षा संबंधी अनियमितताओं ने लाखों मेहनती छात्रों का विश्वास कमजोर किया है। कई परिवार अपनी पूरी जमा-पूंजी बच्चों की पढ़ाई, कोचिंग, यात्रा, फॉर्म फीस और रहने-खाने पर खर्च कर देते हैं। यदि परीक्षा रद्द हो जाए या पेपर लीक हो जाए, तो केवल समय ही नहीं बल्कि आर्थिक और मानसिक नुकसान भी बहुत बड़ा होता है।
युवाओं का मानना है कि यह केवल एक परीक्षा का प्रश्न नहीं, बल्कि देश के भविष्य का प्रश्न है। यदि मेहनत के स्थान पर भ्रष्टाचार हावी हो जाए, तो प्रतिभा का सम्मान कैसे होगा?
हर वर्ष करोड़ों छात्र विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में भाग लेते हैं। फॉर्म शुल्क, कोचिंग, किताबें, किराया, यात्रा और अन्य खर्च मिलाकर परिवारों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता है। यदि किसी परीक्षा में अनियमितता होती है, तो उसका प्रभाव केवल परिणाम पर नहीं बल्कि लाखों परिवारों के विश्वास पर भी पड़ता है। यही कारण है कि छात्र चाहते हैं कि परीक्षा प्रणाली पूरी तरह पारदर्शी, सुरक्षित और जवाबदेह बने ताकि किसी भी ईमानदार अभ्यर्थी की मेहनत व्यर्थ न जाए।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यह है कि सरकार और जनता के बीच संवाद बना रहे। जब लोग अपनी बात शांतिपूर्ण तरीके से रखते हैं, तब सरकार का दायित्व बनता है कि उनकी बात सुने, तथ्यों की जांच करे और उचित निर्णय ले। दूसरी ओर, आंदोलन भी शांतिपूर्ण और संवैधानिक दायरे में रहकर ही अपनी नैतिक शक्ति बनाए रखते हैं।
भारत ने ऐसे दौर भी देखे हैं जब जनता और सत्ता के बीच दूरी बढ़ी। आपातकाल का समय अक्सर इस संदर्भ में चर्चा का विषय रहा है। इतिहास हमें यही सिखाता है कि किसी भी लोकतंत्र में संवाद, पारदर्शिता और जवाबदेही सबसे बड़ी ताकत होती है। अंततः जनता का विश्वास ही किसी भी सरकार की सबसे बड़ी पूंजी है।
एक परिवार से लेकर देश तक हर परिवार में ऐसा होता है कि बच्चे अपनी बात रखते हैं। कभी माता-पिता पहले सख्ती दिखाते हैं, लेकिन बाद में संवाद होता है और समाधान निकलता है। यही संवेदनशीलता समाज और शासन में भी दिखाई देनी चाहिए। असहमति को विरोधी नहीं, बल्कि सुधार का अवसर समझा जाना चाहिए।
जब किसी परीक्षा का पेपर लीक होता है, तो केवल प्रश्नपत्र नहीं टूटता, बल्कि लाखों युवाओं का विश्वास भी टूटता है।
जब मेहनत करने वाला छात्र खुद को असहाय महसूस करता है, तब यह केवल उसकी व्यक्तिगत पीड़ा नहीं होती, बल्कि पूरे देश के भविष्य का सवाल बन जाता है।
सरकार, विपक्ष, न्यायपालिका, शिक्षा संस्थान और समाजकृसभी की जिम्मेदारी है कि युवाओं को यह भरोसा दिलाया जाए कि उनकी मेहनत सुरक्षित है और उनका भविष्य किसी भ्रष्ट व्यवस्था के भरोसे नहीं छोड़ा जाएगा।
लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि जनता की आवाज सुनने, सवालों का जवाब देने और समय पर न्यायपूर्ण निर्णय लेने से मजबूत होता है।
