जनता के सवाल गायब हैं तो पत्रकारिता बीमार नहीं, फिर क्या है?
लेखक: विनेश ठाकुर ‘कर्पूरी’
सम्पादक, विधान केसरी, लखनऊ
जंतर-मंतर के हालिया आंदोलन ने सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बढ़ती दूरी के साथ-साथ जनता और मुख्यधारा की पत्रकारिता के बीच गहरे अविश्वास को भी उजागर कर दिया। बड़े समाचार चैनलों के प्रतिनिधि लगभग गायब रहे और प्रिंट मीडिया के कई पत्रकार भी दबे-छिपे कवरेज करते नजर आए। सोशल मीडिया और स्वतंत्र मंचों से जुड़े पत्रकार अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय दिखे।
जो मुख्यधारा का पत्रकार आंदोलन स्थल पर पहुंचा, उसे कई जगह आंदोलनकारियों के गुस्से का सामना करना पड़ा। एक बड़े मीडिया संस्थान के पत्रकार से कथित मारपीट की घटना ने गंभीर सवाल खड़े किए। किसी चैनल की नीति से असहमति हो सकती है, लेकिन मौके पर मौजूद पत्रकार को पीटना या अपमानित करना किसी भी स्थिति में उचित नहीं है। पत्रकार न सरकार होता है, न चैनल का मालिक और न हर खबर दिखाने का अंतिम निर्णय उसी के हाथ में होता है।
आज पत्रकार तीन दबावों के बीच पिस रहा है—सरकार का दबाव, मालिक और विज्ञापनदाता की फटकार तथा जनता का गुस्सा। ऊपर से नौकरी बचाने की चिंता अलग। ऐसे में वह सरकार की माने, मालिक की सुने या पीड़ित जनता की आवाज उठाए?
मालिक निर्णय करता है, पत्रकार निशाना बनता है
अधिकांश संवाददाता केवल कर्मचारी होते हैं। वे खबर भेजते हैं, लेकिन उसे दिखाया या छापा जाएगा या नहीं, इसका फैसला अक्सर संपादक और मालिक करते हैं। रिपोर्टर पूरी खबर लिखता है, मगर विज्ञापन, टीआरपी, राजनीतिक दबाव या व्यावसायिक हितों के कारण खबर दबा दी जाती है।
गलती व्यवस्था और मालिकों की होती है, लेकिन गाली और मार पत्रकार खाता है।
खबरों से जनता गायब
मीडिया संस्थानों में कारोबार, विज्ञापन और राजनीतिक संबंध इतने हावी हो गए हैं कि जनसरोकार पीछे छूटते जा रहे हैं। स्क्रीन पर उद्योगपतियों की शादियां, फिल्मी सितारे, ज्वेलरी, रियलिटी शो और नेताओं के भाषण दिखाई देते हैं, लेकिन गरीब की रोटी, बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, टूटते पुल, खराब सड़कें, दम तोड़ती शिक्षा, जातिगत भेदभाव और पीड़ितों के आंसू गायब रहते हैं।
जब खबरों से जनता ही गायब हो जाए, तो जनता चैनल क्यों देखे और अखबार क्यों खोले?
कमी पत्रकारों की नहीं, स्वतंत्रता की है
ईमानदार और मेहनती पत्रकार आज भी मौजूद हैं, लेकिन उनकी कलम पर नौकरी का भय, मुकदमों का खतरा, विज्ञापन का दबाव और सत्ता की नाराजगी भारी पड़ती है। सरकार के विरुद्ध लिखें तो नोटिस और मुकदमे, मालिक के हितों के विरुद्ध जाएं तो नौकरी खतरे में और जनता की अपेक्षा पूरी न हो तो गाली तथा मारपीट।
पत्रकार से चमत्कार की उम्मीद की जाती है, जबकि उसके पास निर्णय का अधिकार तक नहीं होता।
मीडिया और आंदोलनकारी दोनों आत्ममंथन करें
मीडिया संस्थान अपनी मजबूरियों की आड़ लेकर जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। पत्रकारिता का काम सत्ता की प्रशंसा नहीं, बल्कि उससे सवाल करना और जनता की पीड़ा सामने लाना है। मालिकों को तय करना होगा कि वे लोकतंत्र के प्रहरी रहेंगे या बाजार के प्रचारक।
आंदोलनकारियों को भी मर्यादा समझनी होगी। किसी चैनल से नाराजगी हो तो उसके मालिक और संपादकीय नीति का लोकतांत्रिक विरोध करें, मौके पर मौजूद पत्रकार को दुश्मन न मानें। वही कैमरा और वही कलम किसी दिन उनके पक्ष का सच सामने ला सकती है।
आखिर क्या करे पत्रकार?
पत्रकार सरकार की चमचागिरी करे तो बिकाऊ कहलाता है। मालिक की बात न माने तो नौकरी जाती है। पीड़ितों की आवाज उठाए तो मुकदमे झेलता है और खबर न दिखा पाए तो जनता घेर लेती है।
इस संकट का समाधान पत्रकारों को गाली देने में नहीं, बल्कि पत्रकारिता को स्वतंत्र बनाने में है। सरकार को आलोचना सहनी होगी, मालिकों को कलम आजाद करनी होगी और जनता को पत्रकार तथा मीडिया मालिक के बीच का अंतर समझना होगा।
आज पत्रकारिता बीमार है, क्योंकि उसकी आत्मा पर सत्ता, बाजार और भय—तीनों का दबाव है।
