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कौन बनेगा सुल्तान, किसके टूटेंगे अरमान


 लेखक: विनेश ठाकुर

सम्पादक, विधान केसरी, लखनऊ

उत्तर प्रदेश की राजनीति एक बार फिर निर्णायक बदलाव की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। वर्षों तक दलित, अतिपिछड़े और वंचित समाज को केवल वोट बैंक समझने वाले राजनीतिक दल अब बेचैन हैं। हर पार्टी स्वयं को इन वर्गों की सबसे बड़ी हितैषी बताने में जुटी है, लेकिन असली सवाल यह है कि आने वाले समय में दलित-अतिपिछड़ा राजनीति का वास्तविक नेतृत्व किसके हाथ में होगा? कौन इन समाजों को केवल भाषण नहीं, बल्कि सत्ता, सम्मान और हिस्सेदारी दिलाएगा?

आज दलित राजनीति के नाम पर अनेक नेता मैदान में हैं। कोई स्वयं को बहुजन राजनीति का स्वाभाविक उत्तराधिकारी बता रहा है, कोई नए गठबंधन और नए नारों के सहारे अपनी जमीन बनाने का प्रयास कर रहा है। अतिपिछड़े समाज के बीच भी अनेक संगठन और नेता सक्रिय हैं। मगर केवल बड़े-बड़े दावे करने, मंचों से हुंकार भरने और सोशल मीडिया पर भीड़ दिखाने से राजनीतिक नेतृत्व स्थापित नहीं होता। राजनीति का असली फैसला संगठन, जनाधार, सामाजिक स्वीकार्यता और चुनावी परिणाम करते हैं।

बसपा का कमजोर होता जनाधार चिंता का विषय

बहुजन समाज पार्टी ने कभी उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित समाज को ऐसी शक्ति दी थी, जिसकी कल्पना भी कठिन थी। वर्ष 2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाकर बसपा ने यह सिद्ध किया था कि दलित नेतृत्व केवल सत्ता में भागीदार ही नहीं, बल्कि अपने दम पर सरकार भी बना सकता है। उस दौर में दलितों के साथ पिछड़े, मुस्लिम और सवर्ण मतदाताओं का एक बड़ा सामाजिक गठबंधन तैयार हुआ था।

लेकिन इसके बाद के चुनावों में बसपा का जनाधार लगातार कमजोर होता गया। लोकसभा और विधानसभा चुनावों में उसका मत प्रतिशत घटा तथा प्रतिनिधित्व भी सिकुड़ता चला गया। पार्टी की सबसे बड़ी समस्या यह रही कि जमीनी संगठन और नए नेतृत्व को पर्याप्त अवसर नहीं मिला। दलित समाज का एक हिस्सा आज भी बसपा को अपना राजनीतिक घर मानता है, मगर नई पीढ़ी परिणाम, सक्रियता और संघर्ष भी देखना चाहती है।

केवल पुरानी उपलब्धियों के आधार पर भविष्य की राजनीति नहीं जीती जा सकती। संगठन को जमीनी स्तर पर फिर से सक्रिय करना होगा, युवाओं को जिम्मेदारी देनी होगी और समाज के बीच लगातार संवाद स्थापित करना होगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो दलित वोटों में बिखराव और अधिक बढ़ सकता है।

चंद्रशेखर आजाद का उभार, लेकिन अग्निपरीक्षा बाकी

नगीना लोकसभा क्षेत्र से जीत के बाद चंद्रशेखर आजाद दलित राजनीति के एक उभरते चेहरे के रूप में सामने आए हैं। उनके संघर्ष, आक्रामक शैली और युवाओं के बीच प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता। वे सड़क पर उतरने, पीड़ित परिवारों के बीच जाने और अन्याय के विरुद्ध मुखर होने के कारण चर्चा में बने रहते हैं।

लेकिन एक लोकसभा सीट की सफलता को पूरे प्रदेश के स्थायी जनाधार के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। दलित राजनीति का बड़ा नेतृत्व बनने के लिए जाटव समाज के साथ-साथ पासी, वाल्मीकि, कोरी, खटीक, धोबी और अन्य दलित जातियों का विश्वास भी अर्जित करना होगा। साथ ही अतिपिछड़े, अल्पसंख्यक और गरीब सवर्ण मतदाताओं को जोड़ने वाली व्यापक राजनीतिक दृष्टि प्रस्तुत करनी होगी।

केवल विरोध की राजनीति पर्याप्त नहीं है। जनता रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, आरक्षण, भूमि, सम्मान और सत्ता में भागीदारी पर स्पष्ट कार्यक्रम चाहती है। चंद्रशेखर आजाद के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती अपने आंदोलन को मजबूत संगठन और चुनावी विकल्प में बदलने की है।

मायावती को कम आंकना भूल होगी

राजनीति में कई बार शांत दिखाई देने वाला खिलाड़ी अंतिम समय में पूरी बाजी पलट देता है। इसलिए बसपा प्रमुख मायावती को राजनीतिक रूप से समाप्त मान लेना गंभीर भूल होगी। उनके पास आज भी व्यापक पहचान, अनुभवी कार्यकर्ता और दलित समाज के एक बड़े वर्ग का भरोसा है।

लेकिन यह भी सत्य है कि केवल पुराने कैडर के सहारे 2027 की लड़ाई आसान नहीं होगी। बसपा को अपने पुराने सामाजिक गठबंधन को दोबारा खड़ा करना होगा। संगठन में नई पीढ़ी, महिलाओं, अतिपिछड़ों, अतिदलितों और अल्पसंख्यकों को प्रभावी जिम्मेदारी देनी होगी। पार्टी को यह भी बताना होगा कि वह सत्ता तक पहुंचने के लिए कौन-सा नया राजनीतिक और सामाजिक फार्मूला लेकर मैदान में उतरेगी।

अतिपिछड़ों के नाम पर राजनीति, नेतृत्व किसी और का उत्तर प्रदेश की राजनीति में अतिपिछड़े समाज की संख्या बहुत बड़ी है, लेकिन सत्ता और संगठन में उसकी हिस्सेदारी आज भी सीमित है। नाई, सैनी, पाल, प्रजापति, कश्यप, निषाद, बिंद, केवट, धीवर, बढ़ई, लोहार, कुम्हार, तेली, बारी और अनेक दस्तकार जातियां चुनावों में निर्णायक भूमिका निभाती हैं। इसके बावजूद इन समाजों को अधिकतर टिकट, पद और सत्ता में वास्तविक अधिकार के बजाय केवल आश्वासन मिलता रहा है।

हर चुनाव से पहले अतिपिछड़ों को सम्मान देने का वादा किया जाता है। कोई सम्मेलन करता है, कोई जातीय प्रतिनिधि मंडल बनाता है और कोई कुछ नेताओं को पद देकर पूरे समाज की भागीदारी का दावा कर देता है। चुनाव समाप्त होते ही वही समाज फिर हाशिए पर छोड़ दिया जाता है।

अतिपिछड़ों की सबसे बड़ी कमजोरी उनका राजनीतिक बिखराव है। छोटी-छोटी जातीय पहचान और व्यक्तिगत नेतृत्व की होड़ ने उन्हें साझा राजनीतिक शक्ति बनने से रोका है। जब तक ये समाज अपनी संख्या को संगठित मत में नहीं बदलेंगे, तब तक दूसरे दल उनके वोटों से सत्ता बनाते रहेंगे और उन्हें केवल दर्शक बनाकर रखेंगे।

भाजपा और सपा दोनों की नजर निर्णायक वोट पर

भाजपा ने पिछले वर्षों में गैर-यादव पिछड़ों और गैर-जाटव दलितों को जोड़कर बड़ी चुनावी सफलता प्राप्त की। उसने सामाजिक प्रतिनिधित्व, कल्याणकारी योजनाओं और हिन्दुत्व के सहारे एक व्यापक मतदाता गठबंधन बनाया। लेकिन अब इन वर्गों के भीतर यह सवाल उठने लगा है कि वोट के अनुपात में टिकट, नेतृत्व और सत्ता में वास्तविक हिस्सेदारी कितनी मिली?

समाजवादी पार्टी भी पीडीए के माध्यम से पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों को एक मंच पर लाने का दावा कर रही है। लोकसभा चुनाव में इस रणनीति से उसे लाभ मिला, लेकिन विधानसभा चुनाव में उसकी असली परीक्षा होगी। उसे यह सिद्ध करना होगा कि पीडीए केवल चुनावी नारा नहीं, बल्कि संगठन, टिकट वितरण और सत्ता में भागीदारी का ईमानदार कार्यक्रम है।

कांग्रेस भी दलित और अतिपिछड़े नेतृत्व को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रही है। मगर उत्तर प्रदेश में उसका संगठन अभी इतना मजबूत नहीं है कि केवल बड़े चेहरों और घोषणाओं के आधार पर सत्ता की मुख्य लड़ाई में आ सके। उसे गांव, ब्लॉक और बूथ स्तर तक लंबे संघर्ष की आवश्यकता है।

राजनीतिक सुल्तान भाषणों से नहीं, हिस्सेदारी से बनेगा

दलित-अतिपिछड़ा राजनीति का अगला सुल्तान वह नहीं होगा जो सबसे ऊंची आवाज में भाषण देगा। वास्तविक नेतृत्व वही करेगा जो समाज को संगठित करेगा, योग्य कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ाएगा और चुनाव में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करेगा।

जो नेता अपने समाज के लोगों को केवल भीड़ समझता है, वह अधिक समय तक उनका प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। समाज अब यह पूछेगा कि कितने टिकट दिए गए, संगठन में कितने महत्वपूर्ण पद मिले, सरकार बनने पर कितने मंत्री बनाए गए और शिक्षा, रोजगार तथा आर्थिक उन्नति के लिए क्या ठोस योजना लागू की गई।

दलितों और अतिपिछड़ों को भी केवल किसी नेता की जय-जयकार करने के बजाय अपने अधिकारों का हिसाब मांगना होगा। उन्हें यह तय करना होगा कि उनका वोट भावनाओं, जातीय उकसावे और क्षणिक नारों पर जाएगा या सत्ता में बराबर भागीदारी के स्पष्ट कार्यक्रम पर।

2027 में टूट सकते हैं कई भ्रम

उत्तर प्रदेश का 2027 विधानसभा चुनाव अनेक राजनीतिक भ्रम तोड़ सकता है। जो नेता अपने समाज को निजी जागीर समझते हैं, उन्हें जनता जवाब दे सकती है। जो दल बिना हिस्सेदारी दिए वोटों पर स्थायी अधिकार मानकर बैठे हैं, उनके समीकरण बिगड़ सकते हैं। सोशल मीडिया की लोकप्रियता और मंचों की भीड़ को वास्तविक मतों में बदलना हर नेता के लिए आसान नहीं होगा।

आने वाला चुनाव यह भी तय करेगा कि दलित राजनीति पुराने नेतृत्व के साथ पुनर्जीवित होगी, किसी नए चेहरे के पीछे संगठित होगी या अनेक हिस्सों में बंटकर दूसरे दलों की सरकार बनाने का साधन बन जाएगी। अतिपिछड़ा समाज भी यदि साझा नेतृत्व और न्यूनतम राजनीतिक कार्यक्रम पर एकजुट हुआ तो वह सत्ता की दिशा बदल सकता है।

समय रहते जागना होगा

व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं, जातीय अहंकार और छोटे-छोटे पदों की होड़ ने वंचित समाज की राजनीतिक शक्ति को कमजोर किया है। अब समाज को तय करना होगा कि वह दूसरों की पालकी ढोता रहेगा या स्वयं सत्ता का दावेदार बनेगा।

दलित और अतिपिछड़ा समाज किसी एक व्यक्ति की जागीर नहीं है। जो उनके दुख-दर्द में साथ खड़ा होगा, संगठन तैयार करेगा, सम्मान देगा और जनसंख्या के अनुपात में राजनीतिक हिस्सेदारी सुनिश्चित करेगा, वही भविष्य का नेतृत्व करेगा।

बड़बोले नेताओं के अरमान तभी धरे रह जाएंगे, जब समाज जागरूक होकर व्यक्ति नहीं, नीति को चुनेगा; नारा नहीं, भागीदारी मांगेगा; और भीड़ नहीं, संगठित राजनीतिक शक्ति बनेगा। उत्तर प्रदेश की राजनीति का अगला सुल्तान वही होगा, जो दलितों और अतिपिछड़ों को वोट बैंक नहीं, सत्ता का वास्तविक मालिक बनाएगा।

लेखक

विनेश ठाकुर सम्पादक 

विधान केसरी लखनऊ

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