लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी में भ्रष्टाचार और सरकारी संसाधनों के खुलेआम दुरुपयोग का एक बेहद चैंकाने वाला मामला सामने आया है। लखनऊ नगर निगम के जोन-8 के इंजीनियरिंग विभाग में नियमों को ताक पर रखकर ठेकेदार को अनुचित लाभ पहुंचाने का बड़ा कारनामा उजागर हुआ है।
आरोप है कि ट्रांसपोर्ट नगर क्षेत्र में नालों की सफाई के लिए करीब 5 लाख रुपये का बंपर टेंडर जारी किया गया था, लेकिन धरातल पर ठेकेदार की मशीनों के बजाय नगर निगम की सरकारी जेसीबी से धड़ल्ले से सफाई कराई जा रही है। इस पूरे खेल में इंजीनियरिंग विभाग के अधिकारियों और जूनियर इंजीनियर की भूमिका सीधे तौर पर संदेह के घेरे में है।
मामला ट्रांसपोर्ट नगर इलाके का है, जहाँ पार्किंग नंबर 1, 2, 3 और 5 के पास स्थित बडे नालों की सफाई का कार्य कराया जा रहा है। बरसात के मौसम में जलभराव की स्थिति से निपटने के लिए नगर निगम ने इस काम का टेंडर एक निजी ठेकेदार को आवंटित किया था।
नियमों के मुताबिक, टेंडर की कुल अनुमानित लागत लगभग 5 लाख रुपये में ठेकेदार को अपने मजदूर, अपनी मशीनें और अपने ईंधन (डीजल) का इस्तेमाल करना था। लेकिन मौके पर स्थिति इसके ठीक उलट है। अधिकारियों की सह पर ठेकेदार की श्चांदीश् हो रही है और काम सरकारी खर्च पर निपटाया जा रहा है। नियमतः ष्जब टेंडर निजी फर्म को दिया गया है, तो डीजल से लेकर ड्राइवर तक का खर्च सरकारी खजाने से क्यों वहन किया जा रहा है? यह सीधे तौर पर जनता के टैक्स के पैसे की चोरी और ठेकेदार को फायदा पहुंचाने का संगठित प्रयास है।ष्
इस पूरे घटनाक्रम ने नगर निगम की कार्यप्रणाली और उसकी निगरानी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। पहला सवाल यह उठता है कि जब ठेकेदार को लाखों रुपये का टेंडर जारी किया गया, तो उसने मौके पर अपनी जेसीबी और संसाधन क्यों नहीं लगाए ? दूसरा सवाल कि सरकारी जेसीबी को ट्रांसपोर्ट नगर की पार्किंगों में काम करने के लिए किसके लिखित या मौखिक आदेश पर भेजा गया ? तीसरा सवाल कि सरकारी मशीन, सरकारी डीजल और सरकारी कर्मचारी का इस्तेमाल करके जो पैसा बचाया जा रहा है, वह किसकी जेब में जा रहा है? चैथा सवाल कि क्या नगर आयुक्त और उच्चाधिकारी इस मामले का संज्ञान लेकर इंजीनियरिंग विभाग के भ्रष्ट सिंडिकेट पर कार्रवाई करेंगे?
सूत्रों के अनुसार जोन-8 के इंजीनियरिंग विभाग और संबंधित जेई को इस पूरे खेल की पूरी जानकारी है। आरोप तो यहाँ तक हैं कि अधिकारियों की मूक सहमति और मिलीभगत के बिना इतनी बड़ी लापरवाही संभव ही नहीं है। सरकारी संसाधनों से काम पूरा कराकर ठेकेदार से पूरा बिल पास कराने की तैयारी चल रही थी, ताकि अंदरखाने मोटी रकम को आपस में बांटा जा सके।
सरकारी मशीनरी के इस तरह के दुरुपयोग से नगर निगम के उन दावों की हवा निकल गई है, जिसमें पारदर्शिता की बातें की जाती हैं। यदि इस मामले की उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जांच कराई जाती है, तो लॉग-बुक और जीपीएस ट्रैकिंग के जरिए यह साफ हो जाएगा कि सरकारी जेसीबी कितने दिनों से ठेकेदार का काम मुफ्त में कर रही थी।
फिलहाल, यह मामला सामने आने के बाद नगर निगम मुख्यालय में भी हड़कंप मच गया है। अब देखना यह होगा कि दोषियों के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई होती है या हर बार की तरह जांच के नाम पर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।
