शुक्रवार के दिन क्यों रखा जाता है संतोषी माता का व्रत? जानिए महत्व और क्या है पूजा विधि
June 25, 2026
शुक्रवार का दिन हिंदू धर्म में शक्ति और समृद्धि की देवी के पूजन के लिए विशेष माना जाता है। इसी दिन संतोषी माता का व्रत और पूजा करने की परंपरा है। किसी विशेष मनोकामना के पूर्ण होने की इच्छा से लोग संतोषी माता का व्रत रखते हैं। मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धा के साथ 16 शुक्रवार तक यह व्रत रखते हैं, उनकी सभी इच्छाएं पूरी होती हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। चलिए जानते हैं इस व्रत का महत्व और पूजा विधि।
शुक्रवार का महत्व
शुक्रवार का दिन देवी लक्ष्मी और संतोषी माता की उपासना के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, संतोषी माता का प्राकट्य शुक्रवार के दिन हुआ था, इसलिए यह दिन उन्हें अत्यंत प्रिय है।
व्रत का धार्मिक महत्व
संतोषी माता का व्रत जीवन की सभी मनोकामनाओं को पूरा करने वाला माना जाता है। ऐसा विश्वास है कि 16 शुक्रवार का व्रत करने से अच्छे जीवनसाथी की प्राप्ति, संतान सुख और पारिवारिक खुशहाली मिलती है।
संतोषी माता व्रत की पूजा विधि
शुक्रवार के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें। मन को शांत और पवित्र रखें।
पूजा स्थल को साफ करें और घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) में पूजा की तैयारी करें।
एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर उस पर संतोषी माता की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
पहले भगवान गणेश और माता ऋद्धि-सिद्धि की पूजा करें।
अब संतोषी माता को जल अर्पित करें और रोली, चंदन, अक्षत, फूल, धूप और दीप अर्पित करें।
पूजा के दौरान संतोषी माता की व्रत कथा का पाठ करें या श्रद्धा पूर्वक सुनें।
भोग के रूप में चना, गुड़ और केला अर्पित करना शुभ माना जाता है।
अंत में संतोषी माता की आरती करें और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करें।
संतोषी माता भोग और व्रत नियम
पूजा में विशेष रूप से चना, गुड़ और केला अर्पित करना शुभ माना गया है। व्रत के दौरान खट्टे पदार्थों का सेवन वर्जित होता है और दिन में केवल एक बार भोजन करने की परंपरा है।
व्रत का उद्यापन और समापन विधि
16 शुक्रवार पूरे होने पर संतोषी माता व्रत का उद्यापन किया जाता है। आखिरी व्रत संपन्न होने के शुभ अवसर पर 8 बच्चों को भोजन कराने का विधान है, जिसे व्रत का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए आवश्यक माना जाता है।
