पीलीभीत। नवीन मंडी परिसर में भ्रष्टाचार, कथित अवैध वसूली और अतिक्रमण के खेल पर प्रशासन ने आखिरकार सख्त तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं। गुरुवार को सिटी मजिस्ट्रेट विजयवर्धन तोमर ने मंडी पहुंचकर लाइसेंस नवीनीकरण के नाम पर व्यापारियों से अवैध वसूली के आरोपों की जांच की, लेकिन जांच के दौरान मामला ऐसा पलटा कि शिकायतकर्ता व्यापारी खुद ही सवालों के घेरे में आ गया। मंडी में कथित उगाही की परतें खुलने से पहले ही अतिक्रमण का जिन्न सामने आ गया और प्रशासन ने साफ कर दिया कि अब न अवैध वसूली बख्शी जाएगी, न सरकारी जमीन और सार्वजनिक मार्गों पर कब्जा।
पूरा मामला मंडी व्यापारी शमसुद्दीन द्वारा जिलाधिकारी को दिए गए शिकायत पत्र से शुरू हुआ। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि मंडी में लाइसेंस नवीनीकरण के नाम पर व्यापारियों से अवैध धन वसूला जा रहा है। शिकायत को गंभीर मानते हुए जिलाधिकारी के निर्देश पर सिटी मजिस्ट्रेट विजयवर्धन तोमर ने नवीन मंडी परिसर पहुंचकर जांच शुरू की। उन्होंने मौके पर कई व्यापारियों से बातचीत की, उनके बयान दर्ज किए और यह जानने का प्रयास किया कि आखिर लाइसेंस नवीनीकरण की प्रक्रिया के नाम पर किस स्तर पर और किसके जरिए कथित वसूली की जा रही है।
मंडी में अफसर के पहुंचते ही हलचल तेज हो गई। व्यापारियों के बीच दिनभर चर्चा का माहौल बना रहा। कई व्यापारियों ने प्रशासन के सामने अपनी बातें रखीं, तो कुछ लोग खुलकर बोलने से बचते भी नजर आए। प्रशासन अब इस बात की तह तक जाने में जुटा है कि शिकायत महज आरोप है या फिर वाकई मंडी के भीतर लाइसेंस नवीनीकरण को उगाही का जरिया बना दिया गया था।लेकिन जांच के बीच कहानी ने नया मोड़ ले लिया। शिकायतकर्ता व्यापारी शमसुद्दीन पर ही मंडी परिसर में निर्धारित सीमा से बाहर कब्जा करने के आरोप सामने आ गए। इस पर सिटी मजिस्ट्रेट ने खुद मौके पर पहुंचकर स्थल का निरीक्षण किया। निरीक्षण में सिर्फ एक व्यापारी का मामला ही नहीं, बल्कि मंडी परिसर के भीतर फैले व्यापक अतिक्रमण की तस्वीर भी सामने आई। कई स्थानों पर व्यापारियों द्वारा अपनी निर्धारित दुकानों या आवंटित स्थानों से बाहर सामान फैलाकर रखने, रास्तों तक कब्जा बढ़ाने और सार्वजनिक जगहों को घेरने की शिकायतें सही मिलती दिखीं।
इसके बाद सिटी मजिस्ट्रेट ने पूरे मंडी क्षेत्र का भ्रमण कर हालात का जायजा लिया। मंडी की सड़कों, सार्वजनिक मार्गों और सरकारी भूमि पर फैले कब्जों को देखकर उन्होंने कड़ा रुख अपनाया। साफ शब्दों में चेतावनी दी गई कि जिन व्यापारियों ने अपनी तय सीमा से बाहर कब्जा कर रखा है, वे दो दिन के भीतर स्वयं अतिक्रमण हटा लें। प्रशासन ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि यदि तय समय में कब्जे नहीं हटाए गए तो उसके बाद बुलडोजर कार्रवाई की जाएगी और किसी तरह की सिफारिश या ढिलाई नहीं चलेगी।
सिटी मजिस्ट्रेट विजयवर्धन तोमर ने कहा कि मंडी परिसर में अवैध वसूली और अतिक्रमण दोनों ही मामलों को गंभीरता से लिया गया है। व्यापारियों को सिर्फ आवंटित स्थान के भीतर ही कारोबार करने की अनुमति है। मुख्य मार्ग, सड़कें और सरकारी भूमि किसी की निजी जागीर नहीं हैं और इन पर कब्जा किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने साफ किया कि नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ नियमानुसार कठोर कार्रवाई की जाएगी।
प्रशासन की इस कार्रवाई को मंडी व्यवस्था में पारदर्शिता लाने की दिशा में अहम माना जा रहा है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि अगर मंडी में अवैध वसूली और अतिक्रमण की शिकायतें इतनी पुरानी हैं तो अब तक जिम्मेदार अधिकारी और मंडी प्रशासन आंखें मूंदे क्यों बैठे रहे? क्या यह खेल लंबे समय से सबकी जानकारी में चल रहा था? और अगर शिकायतकर्ता खुद भी नियमों के घेरे में है, तो क्या मंडी में भ्रष्टाचार और कब्जे का यह तंत्र कहीं ज्यादा गहरा है?
फिलहाल मंडी के व्यापारी, कर्मचारी और प्रशासनिक अमला सबकी निगाहें जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं। देखना अब यह है कि जांच सिर्फ कागजों तक सीमित रहती है या फिर अवैध वसूली के आरोपियों और अतिक्रमणकारियों पर वास्तव में कार्रवाई होती है। मंडी में गुरुवार की हलचल ने इतना तो साफ कर दिया है कि मामला अब केवल एक शिकायत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरी मंडी व्यवस्था की कार्यशैली पर सवाल खड़े हो गए हैं।