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पर्यावरण और हम ​प्रकृति संसाधन नहीं, एक जीवित परिवार है-- मांगे राम चौहान

 


'प्लॉट और पाइपलाइन' की वस्तु-दृष्टि ने पैदा किया पर्यावरणीय संकट, अगली पीढ़ी के लिए बचाना हमारी नैतिक जिम्मेदारी

विशेष संवाददाता, (विधान केसरी लखनऊ)

​"भूमि, जल, पौधे और जानवर: वस्तु नहीं, बल्कि जीवित समुदाय का हिस्सा हैं। केवल जरूरत भर लो, बाकी छोड़ दो ताकि अगली पीढ़ी के लिए बच सके।" पर्यावरण चिंतक मांगे राम चौहान के ये शब्द आज की अंधी दौड़ में फंसी मानव सभ्यता के लिए एक गंभीर चेतावनी भी हैं और संकट से निकलने का रास्ता भी।

​आधुनिक सभ्यता ने प्रकृति को केवल संसाधनों की एक अंतहीन खान मान लिया है। आज जल को पाइपलाइन में बहने वाला सिर्फ एक तरल पदार्थ, जमीन को स्क्वायर फीट में बिकने वाला प्लॉट, पौधों को महज फसल या लकड़ी, और जानवरों को मांस, दूध या मनोरंजन का साधन समझा जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रकृति को देखने की इसी संकुचित 'वस्तु-दृष्टि' ने आज वैश्विक स्तर पर जल संकट, मिट्टी की उर्वरता का ह्रास, जैव विविधता का विनाश और जलवायु परिवर्तन जैसे भयानक संकटों को जन्म दिया है।

एल्डो लियोपोल्ड का 'लैंड एथिक' और जीवित समुदाय

​पर्यावरण विज्ञान और पारिस्थितिकी (Ecology) हमें सिखाते हैं कि जल, जमीन, पौधे और जानवर अलग-अलग वस्तुएँ नहीं, बल्कि एक आपस में जुड़े हुए जीवित समुदाय का हिस्सा हैं। प्रसिद्ध पर्यावरणविद् एल्डो लियोपोल्ड ने अपनी पुस्तक 'A Sand County Almanac' में “Land Ethic” (भूमि नीति) की अवधारणा दी थी। उनके अनुसार, भूमि केवल बेजान मिट्टी नहीं है, बल्कि उसमें रहने वाले सभी जीवों—पौधों, कीटों, पक्षियों, स्तनधारियों और सूक्ष्म जीवों—का एक बेहद जटिल और संवेदनशील समुदाय है।

​इस समुदाय में हर सदस्य का अपना एक विशिष्ट स्थान और योगदान है। मिट्टी के सूक्ष्म जीव पौधों को पोषण देते हैं, पौधे जानवरों को भोजन और आश्रय प्रदान करते हैं, और जानवर बीजों के प्रसार तथा मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखने का काम करते हैं। यह चक्र निरंतर चलता रहता है, जिससे पृथ्वी पर जीवन का संतुलन बना रहता है।

नदी सिर्फ पानी की धारा नहीं

​लेख में स्पष्ट किया गया है कि जल भी अपने आप में एक जीवित समुदाय है। कोई भी नदी सिर्फ पानी का बहाव नहीं होती; उसमें मौजूद बैक्टीरिया, शैवाल, मछलियाँ, जलपक्षी और उसके किनारों पर उगने वाले पेड़-पौधे एक-दूसरे के अस्तित्व से जुड़े रहते हैं। गंगा, यमुना या कोई भी छोटी नदी अपने किनारे बसे गांवों, जंगलों और खेतों के साथ मिलकर एक संपूर्ण जीवित इकाई का निर्माण करती है। जब हम नदियों को प्रदूषित करते हैं या उन पर अनियोजित बांध बनाकर उनकी अविरल धारा को रोकते हैं, तो हम केवल पानी को नहीं रोकते, बल्कि उस पूरे जीवित समुदाय को गहरी चोट पहुँचाते हैं।

पारिस्थितिकी तंत्र के स्थिर और गतिशील स्तंभ

​इस प्राकृतिक समाज में पौधे 'स्थिर सदस्य' हैं। वे सूर्य की ऊर्जा को भोजन में बदलते हैं, ऑक्सीजन देते हैं, मिट्टी को बांधकर रखते हैं और हवा को शुद्ध करते हैं। एक जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होता, बल्कि उसकी जड़ें, सहजीवी फंगी (Fungi) और विभिन्न स्तरों का एक जटिल सामाजिक ढांचा होता है। इसलिए, जब एक पेड़ कटता है, तो केवल वह पेड़ नहीं मरता, बल्कि उस पर निर्भर सैकड़ों जीवों का संसार भी नष्ट हो जाता है।

​दूसरी ओर, जानवर इस समुदाय के 'गतिशील सदस्य' हैं। वे परागण, बीज प्रसार और शिकार-शिकारी के संतुलन को बनाए रखते हैं। उदाहरण के लिए, यदि किसी जंगल से शेर गायब हो जाएं, तो हिरणों की संख्या अत्यधिक बढ़ जाएगी। ये हिरण सभी पौधों को चरकर नष्ट कर देंगे, जिससे मिट्टी का कटाव होगा और अंततः पूरा का पूरा पारिस्थितिकी तंत्र ही तबाह हो जाएगा।

आदिवासी संस्कृतियों से सीख की जरूरत

​यह समुदाय-दृष्टि हमारी आदिवासी संस्कृतियों में सदियों से रची-बसी है। भारतीय आदिवासी समुदाय आज भी पेड़ों को अपना कुलदेवता मानते हैं, नदियों को माता कहते हैं और जमीन को धरती माता के रूप में पूजते हैं। वे प्रकृति का उपयोग अपनी आवश्यकताओं के लिए करते हैं, लेकिन उसका शोषण कभी नहीं करते। उनकी पूजा पद्धतियां और रीति-रिवाज प्रकृति के प्रति इसी गहरे सम्मान और कृतज्ञता को व्यक्त करते हैं।

नीति नहीं, सोच बदलने का वक्त

​आज जब हम प्रकृति को केवल 'माल' या 'प्रॉपर्टी' की तरह देखते हैं, तो हम खुद को भी इस प्रकृति से अलग कर लेते हैं। जबकि कड़वा सच यह है कि हमारा स्वयं का स्वास्थ्य, हमारा भोजन, हवा और हमारी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य इसी जीवित समुदाय पर निर्भर है।

​इस समुदाय-दृष्टि को अपनाने का अर्थ है—नैतिक जिम्मेदारी को समझना। हम प्रकृति का उपयोग करें, लेकिन अत्यधिक दोहन और लालच से बचें। वन रोपण, नदियों की स्वच्छता, जैविक खेती (Organic Farming) और वन्यजीव संरक्षण केवल सरकारी योजनाएं नहीं, बल्कि हमारे व्यक्तिगत कर्तव्य होने चाहिए। जब हम जल, जमीन, पौधे और जानवरों को अपने परिवार की तरह जीवित समुदाय मान लेंगे, तभी हम सच्चे अर्थों में पर्यावरण रक्षक बन पाएंगे। यह बदलाव केवल कागजी नीतियों से नहीं, बल्कि हमारी सोच, संस्कृति और दैनिक व्यवहार को बदलने से ही संभव होगा।

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