पीलीभीत। उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार मुक्त शासन, समयबद्ध निस्तारण और जनसुनवाई की पारदर्शी व्यवस्था के सरकारी दावों के बीच जनपद से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने तहसील और राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां एक किसान ने आरोप लगाया है कि गाटा संख्या 151 में अंश संशोधनध्नामांतरण के लिए दिया गया उसका प्रार्थना पत्र 9 महीने 2 दिन तक फाइलों में दबा रहा, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। किसान का कहना है कि उसने इस दौरान जिलाधिकारी से लेकर मंडलायुक्त तक गुहार लगाई, मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत की, जनप्रतिनिधियों से सिफारिश कराई, फिर भी सुनवाई नहीं हुई। आखिरकार, सिस्टम से निराश और कथित भ्रष्टाचार से तंग आकर किसान ने एक चैंकाने वाला कदम उठायाकृउसने अपनी हिस्सेदारी वाली जमीन एसडीएम सदर और संबंधित लेखपाल को “दान” करने का पत्र जिलाधिकारी को सौंप दिया।
यह पूरा मामला तहसील सदर क्षेत्र के ग्राम उमरसड मु.0 से जुड़ा बताया जा रहा है। पीड़ित संजीव कुमार पुत्र रामलाल ने जिलाधिकारी को दिए अपने शिकायतीध्प्रार्थना पत्र में साफ तौर पर लिखा है कि गाटा संख्या 151, रकबा 0.202 हेक्टेयर में उसके हिस्से के अंश संशोधन का मामला लंबे समय से लंबित पड़ा है। किसान का आरोप है कि इस संबंध में उसने समय-समय पर कई प्रार्थना पत्र दिए, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों ने न तो समय पर कार्रवाई की और न ही कोई संतोषजनक जवाब दिया। किसान ने यह भी लिखा है कि वह लगातार कार्यालयों के चक्कर लगाता रहा, लेकिन हर बार उसे सिर्फ आश्वासन मिला, समाधान नहीं।
संजीव कुमार ने अपने पत्र में दावा किया है कि वह इस प्रकरण में जिलाधिकारी से पांच बार मिल चुका है। इतना ही नहीं, उसने मंडलायुक्त से भी मुलाकात की और अपनी समस्या रखी। जब वहां से भी राहत नहीं मिली तो उसने मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराई। किसान के मुताबिक, उसने यह उम्मीद की थी कि मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत के बाद उसका मामला गंभीरता से लिया जाएगा और राजस्व अभिलेखों में सुधार की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। किसान का कहना है कि सरकारी पोर्टल, अधिकारियों की बैठकों और जनसुनवाई के दावों के बावजूद उसका मामला जस का तस बना रहा। पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि इस प्रकरण में एक जनप्रतिनिधिध्मंत्री स्तर से भी प्रशासनिक अधिकारियों को फोन कर कार्यवाही के लिए कहा गया, लेकिन उसके बाद भी राजस्व विभाग की कार्यशैली में कोई फर्क नहीं पड़ा। किसान का आरोप है कि जब सिफारिश, शिकायत, निवेदन और बार-बार की पैरवी के बाद भी कोई सुनवाई नहीं हुई, तब उसे यह महसूस हो गया कि उसकी समस्या का समाधान सामान्य प्रक्रिया से होने वाला नहीं है।
इस पूरे प्रकरण का सबसे गंभीर पहलू वह आरोप है, जिसमें किसान ने संबंधित लेखपाल पर 20 हजार रुपये की मांग करने की बात लिखी है। किसान का आरोप है कि उससे कहा गया कि अगर काम कराना है तो रुपये देने होंगे, अन्यथा फाइल आगे नहीं बढ़ेगी। पीड़ित के अनुसार उसने रिश्वत देने से इनकार कर दिया, जिसके बाद उसका काम लगातार लटकता चला गया। यही नहीं, किसान ने अपने पत्र में यह भी आरोप लगाया कि गलत अंश चढ़ाने, फर्जी नाम बढ़ाने और अभिलेखों में गड़बड़ी जैसे मामले सामने आए, लेकिन फिर भी किसी जिम्मेदार अधिकारी ने गंभीरता से जांच नहीं कराई। यदि किसान के आरोपों में सच्चाई है, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति की परेशानी नहीं, बल्कि राजस्व व्यवस्था की जड़ों में बैठे उस भ्रष्ट तंत्र की झलक है, जहां आम आदमी को अपने हक के लिए भी महीनों-दर-महीनों दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं। किसान का कहना है कि उसे न्याय मिलने के बजाय उल्टा मानसिक और आर्थिक रूप से परेशान किया गया। खेत-खलिहान और जमीन से जुड़े मामलों में देरी किसी भी ग्रामीण परिवार के लिए बेहद संवेदनशील मुद्दा होती है, क्योंकि इसी पर उसकी आजीविका, सामाजिक स्थिति और पारिवारिक अधिकार जुड़े होते हैं।
जब लगातार कोशिशों के बाद भी मामला आगे नहीं बढ़ा, तो किसान ने विरोध का ऐसा तरीका अपनाया, जिसने हर किसी को चैंका दिया। उसने जिलाधिकारी को दिए पत्र में लिखा कि गाटा संख्या 151 में उसकी जो हिस्सेदारी बनती है, वह उसे अपनी स्वेच्छा से एसडीएम सदर और संबंधित लेखपाल को दान देता है। किसान ने यहां तक लिख दिया कि उसका नाम उक्त गाटा से हटाकर एसडीएम सदर श्रद्धा सिंह और लेखपाल अमित कुमार सक्सेना का नाम दर्ज कर दिया जाए। पत्र में उसने यह भी कहा कि उसे इस “दान” पर कोई आपत्ति नहीं होगी और यदि अधिकारियों को उसके हिस्से की जमीन इतनी ही प्रिय है कि उसका वैधानिक संशोधन नहीं किया जा रहा, तो फिर उसी जमीन पर उनका नाम चढ़ा दिया जाए। यह केवल एक प्रशासनिक शिकायत नहीं, बल्कि व्यवस्था के खिलाफ दर्ज कराया गया एक तीखा प्रतीकात्मक विरोध है। दरअसल किसान का यह कदम इस बात का संकेत है कि वह अब न्याय मिलने की उम्मीद लगभग छोड़ चुका है। वह यह संदेश देना चाहता है कि यदि सरकारी तंत्र किसी नागरिक के अधिकार को उसकी पहुंच, पैरवी या भुगतान की क्षमता के आधार पर तय करेगा, तो फिर ऐसे अधिकारों का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा।
किसान ने अपने पत्र में यह भी लिखा है कि अब उसे अपने पहले दिए गए प्रार्थना पत्रों पर कोई कार्रवाई या संशोधन नहीं चाहिए। उसका कहना है कि जब 9 महीने से अधिक समय तक सुनवाई नहीं हुई, तो अब वह उन सभी प्रार्थना पत्रों को वापस लेने को तैयार है। इस वाक्य के पीछे सिर्फ नाराजगी नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की गहरी हताशा झलकती है, जिसने न्याय पाने की हर संभव कोशिश की, लेकिन बदले में केवल इंतजार, टालमटोल और कथित भ्रष्टाचार का सामना किया। एक आम किसान के लिए जमीन केवल संपत्ति नहीं होतीय वह उसकी मेहनत, परिवार की सुरक्षा और भविष्य की उम्मीद का आधार होती है। ऐसे में यदि किसी हिस्सेदारी या नामांतरण के मामूली से दिखने वाले काम के लिए उसे महीनों तक तहसील के चक्कर लगाने पड़ें, बार-बार अधिकारियों से मिलना पड़े और फिर भी समाधान न निकले, तो यह स्थिति सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि शासन व्यवस्था की संवेदनहीनता को भी उजागर करती है।
इस मामले ने एक बार फिर राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर ऐसा क्यों हुआ कि एक साधारण अंश संशोधनध्नामांतरण का मामला 9 महीने 2 दिन तक लंबित रहा? यदि शिकायतकर्ता बार-बार जिलाधिकारी, मंडलायुक्त और मुख्यमंत्री पोर्टल तक पहुंचा, तो संबंधित अधिकारियों से जवाबदेही क्यों तय नहीं की गई? अगर रिश्वत मांगने और अभिलेखीय गड़बड़ी के आरोप लगाए गए हैं, तो उनकी जांच किस स्तर पर हुई? क्या किसी अधिकारी ने मौके पर जाकर वस्तुस्थिति जानी? क्या संबंधित लेखपाल और राजस्व कर्मियों से स्पष्टीकरण लिया गया? ये सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि राजस्व से जुड़े मामलों में देरी का सीधा असर ग्रामीण जनता पर पड़ता है। नामांतरण, अंश निर्धारण, खतौनी सुधार, विरासत और सीमांकन जैसे मामले गांवों में सबसे ज्यादा विवाद और परेशानी का कारण बनते हैं। यदि इन मामलों में समयबद्ध कार्रवाई न हो, तो छोटे-छोटे विवाद बड़े तनाव और मुकदमों का रूप ले लेते हैं। ऐसे में जनपद का यह मामला केवल एक किसान की व्यथा नहीं, बल्कि पूरी राजस्व व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न है।अब निगाहें जिला प्रशासन की कार्रवाई पर
किसान द्वारा दिया गया यह पत्र अब पूरे जिले में चर्चा का विषय बना हुआ है। आम लोगों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या जिला प्रशासन इस मामले को केवल एक और शिकायत मानकर फाइल में दबा देगा, या फिर इसे गंभीरता से लेते हुए निष्पक्ष जांच कराएगा। यदि किसान के आरोप सही पाए जाते हैं, तो संबंधित कर्मचारियों और अधिकारियों पर क्या कार्रवाई होगी? क्या राजस्व अभिलेखों की जांच कराई जाएगी? क्या रिश्वत मांगने के आरोपों की स्वतंत्र जांच होगी? और सबसे महत्वपूर्णकृक्या पीड़ित किसान को न्याय मिलेगा?
फिलहाल यह मामला जनपद की प्रशासनिक व्यवस्था के सामने एक बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है। किसान का यह “दान पत्र” केवल एक आवेदन नहीं, बल्कि व्यवस्था के खिलाफ दर्ज कराया गया ऐसा प्रतिरोध है, जो बताता है कि जब शिकायतों का समाधान नहीं होता, तो आम आदमी की पीड़ा किस हद तक पहुंच जाती है।
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