- ध्यान दीजिए! आप वर्तमान दौर में वैमनस्यता को तेज़ी से बढ़ावा दे रहे हैं
- जनसंख्या अनुपात में हिस्सेदारी ही बन सकती है वरदान
विशेष रिपोर्ट: -विनेश ठाकुर 'कर्पूरी'
लखनऊ | मथुरा के नरहौली में दलित समाज की बारात पर हुए पथराव और बढ़ते बवाल ने एक बार फिर देश की उस अंतर्निहित सामाजिक दरार को उजागर कर दिया है, जिसे राजनीति और सामाजिक संगठन अपने-अपने तरीके से भुनाने में लगे हैं। इस घटना को महज 'एक्शन का रिएक्शन' या 'सम्मान बनाम अपमान की जंग' कहकर नहीं टाला जा सकता। जानकारों और सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रकार की हिंसक घटनाओं की जड़ें सीधे तौर पर प्रशासनिक निष्क्रियता, बेरोजगारी से उपजे आक्रोश और सत्ता-संसाधनों में जनसंख्या के अनुपात में हिस्सेदारी की अनदेखी से जुड़ी हैं।
चार स्तंभों में हिस्सेदारी की अनदेखी: विवाद की मुख्य जड़
देश को सुचारू रूप से चलाने वाले चारों स्तंभों (विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया) में सभी जातियों और वर्गों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व न मिलना एक बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। हालांकि, हिस्सेदारी तय करने का अधिकार संवैधानिक रूप से सरकार के पास होता है, लेकिन धरातल पर सक्रिय विभिन्न सामाजिक संगठन समाज को 'ब्राह्मण, बनिया, ठाकुर और शूद्र' के खांचों में बांटकर अपनी रोटियां सेक रहे हैं। यही कारण है कि आज जातियों के बीच आपसी वैमनस्यता कम होने के बजाय दिन-दूनी रात-चौगुनी तरक्की कर रही है।
सत्ता के गलियारों में 'रेवड़ी' संस्कृति: एक ही थैली के चट्टे-बट्टे
विगत और वर्तमान राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें, तो जातिगत और धार्मिक भेदभाव का आरोप किसी एक दल पर नहीं, बल्कि बारी-बारी से सभी सरकारों पर लगता रहा है। यह एक कड़वी सच्चाई है कि:
- बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के शासनकाल में दलित वर्ग को विशेष प्राथमिकता मिली।
- समाजवादी पार्टी (सपा) के दौर में यादव और मुस्लिम समीकरणों को तरजीह दी गई।
भारतीय जाना पार्टी (भाजपा) के वर्तमान दौर में ब्राह्मण और ठाकुर वर्ग पर सत्ता की विशेष कृपा और कोलेजियम व्यवस्था की प्रगति को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
'फुटबॉल' बना अतिपिछड़ा समाज: सबसे बड़ा अंतर्विरोध
राजनीति का सबसे स्याह पहलू यह है कि सर्वाधिक जनसंख्या होने के बावजूद अलग-अलग उपजातियों में बंटा 'अतिपिछड़ा वर्ग' प्रत्येक सरकार में खुद को ठगा महसूस करता रहा है। यह वर्ग अब तक अपनी हिस्सेदारी के लिए राजनीतिक दलों के बीच केवल 'फुटबॉल' बनकर रहने को अभिशप्त था। लेकिन बदलते दौर में सामाजिक जागरूकता ने इसे अपनी आवाज दी है, और अब यह समाज इन पार्टियों और सरकारों पर अपनी हिस्सेदारी लूटने का आरोप सीधे तौर पर सिद्ध करने में कोई संकोच नहीं कर रहा है।
मजेदार बात यह है कि एक तरफ भाईचारा बढ़ाने और जातिगत वैमनस्यता को रोकने के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ जब जातिगत जनगणना की बात आती है, तो कथित तौर पर मुख्य सूचियों से ओबीसी (OBC) का वास्तविक वर्गीकरण या कॉलम ही गायब दिखता है। यह चूक या उपेक्षा आक्रामक ओबीसी नेताओं के लिए सबसे बड़ा हथियार बन चुकी है, जो साफ-साफ कहते घूम रहे हैं कि यह विसंगति ओबीसी के अधिकारों पर सीधे तौर पर डाका डालने के समान है।
चाहे जिला, तहसील और थानों में प्रशासनिक नियुक्तियों का मामला हो, कैबिनेट में महत्वपूर्ण विभागों का बंटवारा हो या फिर चुनावी टिकटों का वितरण—तमाम राजनीतिक दल अपने-अपने कोर वोट बैंक को 'रेवड़ी' बांटने में व्यस्त रहते हैं। इसी राजनीतिक दिखावे और स्वार्थ का नतीजा है कि समाज में ध्रुवीकरण की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है।
क्या है समाधान? निष्पक्षता और आनुपातिक प्रतिनिधित्व ही एकमात्र रास्ता
विशेषज्ञों और प्रबुद्ध वर्ग का मानना है कि यदि कोई भी सरकार बड़ा दिल दिखाकर सभी जातियों और धर्मों को उनकी जनसंख्या के उचित अनुपात में बरकरार हिस्सेदारी दे, तो न सिर्फ यह वैमनस्यता हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी, बल्कि राजनीति में 'कॉकरोच पार्टी' जैसे अल्पकालिक शिगूफे भी दिखाई देना बंद हो जाएंगे।
इसके ठोस उपाय के रूप में अब पारंपरिक और स्वार्थी दलों के विकल्प की तलाश पर जोर दिया जा रहा है। देश की सामाजिक व्यवस्था को बचाने का एकमात्र तरीका यह है कि शासन की बागडोर ऐसे निष्पक्ष हाथों में सौंपी जाए, जो:
- सरकारी पोस्टिंग और प्रशासनिक नियुक्तियों में पूर्ण पारदर्शिता और निष्पक्षता बरतें।
- मंत्रिमंडल के विभागों के आवंटन में हर वर्ग को आनुपातिक प्रतिनिधित्व दें।
- विधानसभा और लोकसभा टिकट वितरण में सभी जातियों और धर्मों को जनसंख्या के अनुपात में मैदान में उतारें।
समय रहते चेतना होगा, वरना...
यदि वर्तमान नेतृत्व और राजनीतिक पार्टियां केवल सत्ता हथियाने के लिए देश की प्रतिष्ठा, सामाजिक व्यवस्था और धार्मिक भाईचारे को दांव पर लगाती रहीं, तो वह दिन दूर नहीं जब राष्ट्रीय सुरक्षा से लेकर नागरिक सुरक्षा तक, हर क्षेत्र में केवल राजनीतिक खोखलापन ही नजर आएगा।
वर्तमान नेताओं को यह सोचना होगा कि यदि समय रहते इस सामाजिक जहर को नहीं रोका गया, तो भविष्य में समाज के हर तबके को सिर्फ और सिर्फ पछतावा ही हाथ लगेगा। वरना भाजपा, सपा, बसपा, कांग्रेस से लेकर आज़ाद, राजभर, निषाद, यदुवंशी और मुस्लिम केंद्रित दल अपने-अपने समुदायों को हिस्सेदारी, अपमान और सम्मान की दुहाई दे-देकर वैमनस्यता की आग को हवा देते रहेंगे। नतीजा यह होगा कि एक दिन यह जातिगत और धार्मिक वैमनस्यता देश के कोने-कोने में अपने पैर पसारने में पूरी तरह कामयाब हो जाएगी।
लेखक विनेश ठाकुर कर्पूरी सम्पादक विधान केसरी लखनऊ एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष जन सेवा दल
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