प्रतापगढ़। जिले में जिला कृषि अधिकारी अशोक कुमार ने बुधवार को बताया है कि जनपद में वर्तमान समय में किसानों की आवश्यकता के अनुरूप उर्वरकों की पर्याप्त उपलब्धता है। डीएपी खाद की कोई किल्लत नहीं है। 2744 मीट्रिक टन फॉस्फेटिक उर्वरक की एक और रैक जनपद में 01 नवम्बर 2025 तक प्राप्त हों जाएगी। उन्होने कृषकों से अपील है कि वे “संकट की आशंका” में डीएपी की खरीददारी से बचें तथा आवश्यकता के अनुसार ही उर्वरक का क्रय करें व अधिक मात्रा में भंडारण से बचें। सभी उर्वरक विक्रेता निर्धारित दर पर ही बिक्री करेंगे। कृषकगण उर्वरक क्रय के समय पक्की रसीद अवश्य प्राप्त करें। जिला प्रशासन एवं कृषि विभाग द्वारा उर्वरकों की आपूर्ति एवं वितरण की नियमित निगरानी की जा रही है, जिससे समय से किसानों को खाद उपलब्ध हो सके। उन्होने बताया है कि जनपद में 29 अक्टूबर तक यूरिया 10776 मीट्रिक टन, डीएपी 4817 मीट्रिक टन व एनपीके 6583 मीट्रिक टन उर्वरकों की उपलब्धता है।
उन्होने सभी लाइसेन्स धारी उर्वरक विक्रेताओं को निर्देशित किया है कि वे कृषकों को उनकी जोतध्भूमि (खतौनी विवरण) के आधार पर उर्वरक उपलब्ध करावें। उर्वरकों की विक्रीध्वितरण के साथ अन्य उत्पादों की टैगिंग, ओवर रेटिंग कालाबाजारी तथा तस्करी करते हुए जो भी विक्रेता पाया जाएगा के विरुद्ध उर्वरक अकार्बनिक, कार्बनिक या मिश्रित नियंन्त्रण आदेश -1985 एवं आवश्यक वस्तु अधिनियम-1955 में निहित प्रविधानों के अन्तर्गत कठोर कार्यवाही की जाएगी। जनपद के सभी वरिष्ठ प्राविधिक सहायक (ग्रुप-बी) एवं संबंधित क्षेत्रीय कर्मचारियों को निर्देशित किया गया है कि वे अपने-अपने विकास खंडों में उर्वरक की उपलब्धता एवं वितरण की निगरानी सतत रूप से करें, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि किसानों को उर्वरकों की उपलब्धता में किसी प्रकार की कोई समस्या न हो।
जनपद के कृषक भाई किसी भी प्रकार के अनियमितता यथा उर्वरकों की विक्री निर्धारित दर से अधिक दर पर करने अथवा यूरिया व अन्य उर्वरकों के साथ जबरजस्ती अन्य उत्पादों की टैगिंग दुकानदार द्वारा की जाने की स्थिति में इसकी लिखित सूचना जिला कृषि अधिकारी कार्यालय अथवा दूरभाष नम्बर-7839882339 एवं 9793096573 पर दर्ज करा सकते है, जिससे संबन्धित विक्रेता के विरुद्ध दंडात्मक विधिक कार्यवाही सुनिश्चित की जा सके। जिले में खाद की कमी नहीं है, पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। किसान संतुलित मात्रा और आवश्यकता के हिसाब से ही उसका प्रयोग खेती में करें। जिससे उत्पादन में वृद्धि एवं लागत में कमी हो सके।
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