लखनऊ। प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर और हाई-टेक बनाने के तमाम दावे किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों की धज्जियाँ उड़ा रही है। खुद प्रदेश के उपमुख्यमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री ब्रजेश पाठक के क्षेत्र माने जाने वाले लखनऊ पूर्वी स्थित इंदिरा नगर नगरीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) की बदहाली स्वास्थ्य विभाग के कामकाज पर एक करारा तमाचा है।
एक तरफ जहां विभाग विज्ञापनों और बैठकों में व्यवस्थाएं चाक-चैबंद होने का ढिंढोरा पीटता है, वहीं दूसरी तरफ इसी केंद्र पर मरीज बारिश के बीच खुले आसमान के नीचे लाइन लगाकर पर्चा बनवाने को मजबूर हैं।
सीएचसी के भीतर हाल यह है कि अस्पताल के शौचालय इस कदर गंदे और बदहाल हैं कि गर्भवती महिलाओं और महिला स्वास्थ्यकर्मियों का वहां जाना दूभर हो गया है।अस्पताल प्रशासन की उदासीनता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि डॉक्टर के कक्ष का पंखा तक ठीक नहीं कराया जा सका है।
इन तमाम बुनियादी कमियों के बीच सबसे बड़ा सवाल वित्तीय पारदर्शिता का है। अस्पताल को मिलने वाले बजट के अलावा, श्रोगी कल्याण समितिश् को मिलने वाली धनराशि और नर्सिंग छात्रों से प्रशिक्षण के एवज में वसूले जाने वाले भारी-भरकम शुल्क का हिसाब-किताब कोहरे में लिपटा है। जनता और स्थानीय लोग अब यह सवाल पूछने लगे हैं कि आखिर यह पैसा कहां जा रहा है?
अधीक्षक डॉ. मयंक जलोटे के रवैये पर भी सवालिया निशान हैं, जिन पर अक्सर बैठकों या ऑपरेशनों में व्यस्त होने का बहाना बनाकर न मिलने के आरोप हैं।
यह महज एक अस्पताल की लाचारी नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की कार्यप्रणाली पर एक गंभीर प्रहार है। मुख्य चिकित्सा अधिकारी को चाहिए कि तत्काल इस मामले में हस्तक्षेप कर औचक निरीक्षण करें। रोगी कल्याण समिति के खर्च, प्रशिक्षण शुल्क के रिकॉर्ड और अस्पताल के वित्तीय लेन-देन का विशेष ऑडिट कराया जाए, ताकि दोषी अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई का नजीर पेश किया जा सके।
