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एसआईआर पर खुलासे पर पूर्व CEC एसवाई कुरैशी बोले-ईसी को प्रेस कांफ्रेंस करके सब साफ करना चाहिए


चुनाव आयोग और एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर बवाल हो रहा है. इस बीच पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी का बयान आया है. उन्होंने कहा है कि ऐसा एरोगैंस तो शेषन के जमाने में भी नहीं था. सरकार ने इसको मल्टी मेंबर बनाया था.

एसवाई कुरैशी ने कहा, ''ये बहुत ही सीरियस और एक्सप्लोसिव है. इलेक्शन एक्ट में साफ लिखा है कि इसके डिसिजन Uninamiously होना चाहिए. कोई भी दो. दो कमीशनर मुखालफत कर रहे थे. ऐसा एरोगैंस तो शेषन के जमाने में भी नहीं था. सरकार ने इसको मल्टी मेंबर बनाया था. मेजोरिटी डिसीजन नहीं हुए तो सारे फैसले इलिगल. पिछले डेढ़ साल में जितने डिसीजन हुए उस पर सबकुछ साफ होना चाहिए. अगर बहुमत से डिसीजन नहीं हुआ है तो इलिगल है, उसे पलट देना चाहिए.''

उन्होंने आगे कहा, ''एक्ट में ही लिखा है कि जहां तक हो सर्वसम्मति से होना चाहिए और अगर डिफरेंस हो तो मेजोरिटी से होना चाहिए. अगर मेजोरिटी से डिसीजन नहीं लिए गए हैं तो वह इलिगल है. प्रेस कांफ्रेंस करके सब साफ करना चाहिए ईसी को. इसकी तह तक जाना होगा. क्या क्या डिसीजन डेढ़ साल में हुए. ''

''13 करोड़ डिलीसन वोटर का नाम डालना और हटाना ईआरओ(Electoral Registration Officer) के पास पावर है. मैं जब सीईसी था तो हर बात मैं दोनों ईसी को बताते थे, पूछ कर रखते थे. मेरे समय में सारे डिसीजन सर्वसम्मति से हुए. सीईसी साहब को दोनों ईसी की मौजूदगी में पीसी करके सब साफ करना चाहिए.''

न्यूज एजेंसी से बुधवार को बात करते हुए ओपी रावत ने कहा, "मैं यही कहूंगा कि यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है. चुनाव आयोग में ऐसा शायद ही कभी हुआ हो. वहां काम करने के दौरान मैंने हमेशा देखा कि फैसले सर्वसम्मति से लिए जाते थे और जब भी विचारों में मतभेद होता था, तो एकता बनाए रखने के लिए आम सहमति बनाई जाती थी.

ऐसा लगता है कि इस संस्था पर जनता का भरोसा पूरी तरह से टूट रहा है. जिस संस्था पर लोगों को निष्पक्ष और विश्वसनीय चुनाव कराने का भरोसा था, उसने SIR के जरिए एक ऐसा 'फ्रेंकस्टीन' खड़ा कर दिया है कि हर जगह वोटर डरे हुए हैं.

बता दें द इंडियन एक्सप्रेस अखबार में छपी एक रिपोर्ट के बाद हुआ है जिसमें दावा किया गया है कि SIR पर दो चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति जाहिर की लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने उनकी मांगों को अनसुना कर दिया.

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