लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय से एक बेहद गंभीर मामला सामने आया है। प्रदेश और आसपास के राज्यों से आने वाले गरीब व लाचार मरीजों के जीवन रक्षक कहे जाने वाले इस अस्पताल के ब्लड बैंक पर पक्षपात के आरोप लगे हैं। दावों के मुताबिक, यहाँ प्रभावशाली लोगों और पहुँच वाले मरीजों को बिना किसी अड़चन के तुरंत ब्लड उपलब्ध कराया जा रहा है, जबकि बिना किसी सिफारिश के आए सामान्य मरीजों और उनके लाचार परिजनों को घंटों और कई बार दिनों तक लाइन में खड़े रहना पड़ रहा है।
केजीएमयू के ब्लड बैंक में हर दिन सैकड़ों की संख्या में मरीज और उनके रिश्तेदार पहुँचते हैं। इमरजेंसी, ट्रॉमा सेंटर और गंभीर ऑपरेशनों के लिए खून की तत्काल आवश्यकता होती है। आरोप है कि ब्लड बैंक के कुछ कर्मचारियों और बिचैलियों की मिलीभगत से एक श्वीआईपी कल्चरश् हावी हो चुका है। जब भी किसी नेता, अधिकारी या रसूखदार व्यक्ति का फोन आता है, तो उनके मरीजों के लिए तुरंत ब्लड की व्यवस्था कर दी जाती है।
दूसरी ओर, दूर-दराज के जिलों से आए निर्धन परिजनों को श्स्टॉक खत्म हैश् या श्डोनर की व्यवस्था करोश् जैसे बहाने बनाकर टरका दिया जाता है। समय पर खून न मिलने के कारण कई बार मरीजों की हालत अत्यंत चिंताजनक हो जाती है।
अस्पताल परिसर में मौजूद परिजनों का दर्द साफ छलकता है। कई लोगों का कहना है कि वे सुबह से ही फॉर्म और डोनर लेकर लाइन में लगे रहते हैं, लेकिन उनकी जगह किसी की एक श्पर्चीश् या श्फोन कॉलश् पर काम पहले कर दिया जाता है। इमरजेंसी मामलों में भी प्रक्रियागत पेचीदगियों के नाम पर आम लोगों को परेशान किया जाता है, जिससे उनकी जान पर बन आती है।
इस सनसनीखेज खुलासे के बाद अस्पताल प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं और मरीजों के परिजनों ने शासन-प्रशासन से इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। लोगों का कहना है कि ब्लड बैंक के सीसीटीवी फुटेज खंगाले जाएं ताकि पता चले कि खून वितरण में किसे प्राथमिकता दी जा रही है। ब्लड की उपलब्धता और वितरण की प्रक्रिया को पूरी तरह से डिजिटल और पारदर्शी बनाया जाए। आरोपी कर्मचारियों और बिचैलियों पर सख्त कानूनी व अनुशासनात्मक कार्रवाई हो।
स्वास्थ्य सेवाओं में इस तरह का भेदभाव न केवल मानवता को शर्मसार करता है, बल्कि गरीब मरीजों के जीने के मौलिक अधिकार का भी हनन है। जब जीवनदायिनी बूंदों की भी श्अदृश्य बोलीश् लगने लगे, तो इसे प्रशासनिक लाचारी कहें या बेशर्मी का चरम? लाचार परिजन ब्लड बैंक के बाहर खड़े होकर व्यवस्था की इस संवेदनहीनता पर खून के आंसू रो रहे हैं। देखना यह है कि क्या यह खबर सुनने के बाद केजीएमयू के जिम्मेदार अधिकारियों की सोया हुआ जमीर जागेगा, या फिर रसूख के आगे मरीजों की जान यूं ही दांव पर लगती रहेगी।
