लखनऊ। राजधानी के कैसरबाग स्थित ऐतिहासिक निशात सिनेमा हॉल की जमीन पर कानून और प्रशासनिक बुलडोजर के दावों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। एलडीए (जोन-6) द्वारा जिस बहुमंजिला अवैध निर्माण को सील कर पुलिस अभिरक्षा में सौंपा गया था, वहां सील की धज्जियां उड़ाते हुए निर्माण कार्य धड़ल्ले से जारी है। सिस्टम की इस बड़ी लाचारी और सांठगांठ के खिलाफ आज पीड़ित पक्ष ने मुख्यमंत्री के प्ळत्ै (जनसुनवाई पोर्टल) पर शिकायत दर्ज कराई है।
शिकायतकर्ता का सीधा आरोप है कि सील परिसर में लगातार निर्माण कार्य चल रहा है। इसकी सूचना बार-बार एलडीए के संबंधित जोनल अधिकारी और अवर अभियंता को दी गई। हर बार अधिकारियों ने एक ही रटा-रटाया जवाब देकर पल्ला झाड़ लिया किकृ ष्कैसरबाग थाने को एफआईआर (थ्प्त्) दर्ज कराने के लिए पत्र भेज दिया गया है।ष्
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि केवल कागजी चिट्ठियां भेजने से क्या अवैध निर्माण रुक गया? जब भवन पर एलडीए का ताला लगा है और वह क्षेत्र पुलिस की अभिरक्षा में है, तो आखिर किसकी शह पर मिस्त्री और मजदूर वहां बेखौफ होकर गिट्टी-सीमेंट जोड़ रहे हैं ?
मामले की गंभीरता को देखते हुए सोमवार ाव दर्ज आईजीआरएस शिकायत में एलडीए प्रशासन की मंशा पर सवाल उठाते हुए सीधे जवाब मांगे गए हैं। कैसरबाग पुलिस को एफआईआर के लिए भेजे गए पत्र की पत्रांक संख्या और तारीख क्या है? क्या पुलिस ने इस पर एफआईआर दर्ज की या मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया ? क्या सील भवन में निर्माण जारी रखने या सील खोलने की कोई गुप्त अनुमति एलडीए द्वारा दी गई है ? यदि निर्माण पूरी तरह अवैध है, तो सील की मौजूदगी में काम चलने देने वाले जिम्मेदार अधिकारियों, कर्मचारियों और बेखौफ निर्माणकर्ता पर अब तक क्या दंडात्मक कार्रवाई हुई ?
यह मामला सिर्फ एक अवैध निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लखनऊ विकास प्राधिकरण की साख और उसकी श्सीलश् के वजूद पर सीधा तमाचा है। अगर एलडीए की सील लगने के बाद भी निर्माणकर्ता अपनी मनमर्जी से इमारतें खड़ी कर सकता है, तो आम जनता का प्रशासन के इकबाल से भरोसा उठना तय है।
अब देखना यह होगा कि प्ळत्ै पर शिकायत दर्ज होने के बाद एलडीए के आलाधिकारी मौके पर पहुंचकर निर्माण को ध्वस्त कराते हैं और दोषियों पर कार्रवाई करते हैं, या फिर यह मामला भी कागजों की परतों के नीचे दबा दिया जाएगा!
