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महापुरुष बाबा लक्खी शाह बंजारा को मंचों पर नमन, लेकिन उनके समाज को सत्ता में हिस्सेदारी कब?


प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री से लेकर बड़े नेता करते हैं गौरवगान, बंजारा समाज का सवाल—सम्मान केवल भाषणों में क्यों, विधानसभा और मंत्रिमंडल में क्यों नहीं?


भारतीय इतिहास की यह बड़ी विडंबना है कि जिन महापुरुषों ने धर्म, मानवता, स्वाभिमान और न्याय की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया, उनमें वंचित, घुमंतू, विमुक्त और अतिपिछड़े समाज से आने वाले अनेक महानायकों को वह स्थान नहीं मिला जिसके वे वास्तविक अधिकारी थे। बाबा लक्खी शाह बंजारा—जिन्हें लक्खी राय बंजारा के नाम से भी स्मरण किया जाता है—ऐसा ही एक अमर नाम हैं।

सन् 1675 में सिखों के नौवें गुरु, गुरु तेग बहादुर जी की दिल्ली के चांदनी चौक में शहादत के बाद भय का ऐसा वातावरण था कि उनके पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार करना भी जान जोखिम में डालने जैसा था। ऐसी परिस्थितियों में बाबा लक्खी शाह बंजारा आगे आए। प्रचलित ऐतिहासिक परंपरा के अनुसार वह गुरु साहिब के पावन धड़ को अपने घर तक लेकर गए और पहचान छिपाते हुए अंतिम संस्कार करने के लिए अपने घर को ही अग्नि के हवाले कर दिया। आज गुरुद्वारा रकाब गंज साहिब उस त्याग और साहस की स्मृति से जुड़ा हुआ है।

सौ से अधिक विधानसभा क्षेत्रों में प्रभाव का दावा; अब ‘दूसरों की पालकी’ नहीं, अपने राजनीतिक नेतृत्व और जनसंख्या अनुपात में हिस्सेदारी की आवाज

ऐसे महान बलिदानी के सामने पूरा देश सिर झुकाता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और अनेक राष्ट्रीय नेता बाबा लक्खी शाह बंजारा के योगदान का उल्लेख करते रहे हैं। लेकिन यहीं से एक बड़ा राजनीतिक सवाल पैदा होता है—क्या किसी समाज के महापुरुष को माल्यार्पण कर देना ही उस समाज का सम्मान है?

बंजारा समाज के भीतर आज यही पीड़ा मुखर होती दिखाई दे रही है कि “हमारे महापुरुष सबके हैं, लेकिन सत्ता में हमारा हिस्सा कहां है?”

समाज के प्रतिनिधियों का आरोप है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी उत्तर प्रदेश की राजनीति में बंजारा समाज को उसकी आबादी और सामाजिक उपस्थिति के अनुरूप प्रतिनिधित्व नहीं मिला। समाज के कार्यकर्ता यह सवाल उठा रहे हैं कि जब चुनाव आता है तो उनके महापुरुषों की जयंती और स्मृति दिवस पर बड़े-बड़े संदेश जारी होते हैं, लेकिन टिकट वितरण, विधानसभा, विधान परिषद, राज्यसभा और मंत्रिमंडल की हिस्सेदारी तय करते समय वही समाज राजनीतिक दलों की प्राथमिकता से बाहर क्यों हो जाता है?

यही असंतोष अब राजनीतिक चेतना में बदलता दिखाई दे रहा है।

हाल में बारा बंजारा समाज कल्याण समिति के बैनर तले जुटे हजारों लोगों के बीच यह दर्द खुलकर सामने आया। वक्ताओं ने विभिन्न सरकारों और राजनीतिक दलों पर बंजारा समाज की राजनीतिक उपेक्षा का आरोप लगाया। समाज से जुड़े नेताओं का दावा है कि उत्तर प्रदेश की सौ से अधिक विधानसभा सीटों पर बंजारा समाज की उल्लेखनीय मौजूदगी है और कई क्षेत्रों में उसकी संख्या दस से बीस हजार अथवा उससे अधिक तक प्रभाव डाल सकती है।

अब इसी सामाजिक शक्ति को राजनीतिक शक्ति में बदलने की बात कही जा रही है।

लक्खी शाह समाज क्रांतिकारी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हरीश नायक बंजारा और राष्ट्रीय महासचिव गिरीश नायक बंजारा ने स्पष्ट संदेश दिया है कि समाज अब किसी राजनीतिक दल के पीछे आंख बंद करके चलने के बजाय अपने राजनीतिक अधिकारों की लड़ाई स्वयं लड़ेगा। उनका कहना है कि बंजारा समाज के विभिन्न धड़ों को एक मंच पर लाकर अन्य अतिपिछड़ी और अतिदलित जातियों के साथ राजनीतिक गठजोड़ खड़ा किया जाएगा और जनसंख्या अनुपात में हिस्सेदारी को राजनीति का केंद्रीय मुद्दा बनाया जाएगा।

यह घोषणा केवल एक पार्टी के गठन अथवा चुनाव लड़ने तक सीमित नहीं समझी जानी चाहिए। यह उस राजनीतिक बेचैनी का संकेत है जो उन तमाम छोटी और अतिपिछड़ी जातियों में बढ़ रही है जिन्हें चुनाव के समय वोट बैंक समझा जाता है, लेकिन चुनाव खत्म होते ही सत्ता की मेज पर उनकी कुर्सी गायब हो जाती है।

महापुरुष हमारा, वोट हमारा—तो सत्ता में हिस्सा किसका?

यही प्रश्न अब बंजारा समाज पूछ रहा है।


अगर बाबा लक्खी शाह बंजारा राष्ट्रनायक हैं तो उनके समाज को राष्ट्र की राजनीतिक व्यवस्था में उचित स्थान क्यों नहीं? यदि उनके बलिदान पर सरकारें गर्व करती हैं तो उनके वंशजों और समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर भी उतनी ही गंभीरता क्यों नहीं दिखाई जाती?

लोकतंत्र में केवल किसी महापुरुष की प्रतिमा लगाना, उनकी तस्वीर पर फूल चढ़ाना अथवा उनकी जयंती पर संदेश जारी करना पर्याप्त नहीं है। असली सम्मान तब होगा जब उनके समाज के नौजवान विधायक, सांसद, मंत्री, अधिकारी और नीति-निर्माता बनेंगे।

आज बंजारा समाज के भीतर से यह आवाज निकल रही है कि उसे किसी दल से खैरात नहीं चाहिए, सत्ता में भागीदारी चाहिए। महापुरुषों के नाम पर वोट मांगने की राजनीति अब ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकती। यदि किसी समाज की आबादी चुनाव परिणाम प्रभावित करती है तो राजनीतिक दलों को उसके बीच से नेतृत्व भी तैयार करना होगा।

इतिहास में सम्मान और सत्ता में हिस्सेदारी—दोनों जरूरी

सरकारों को बाबा लक्खी शाह बंजारा के इतिहास को राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय शैक्षिक पाठ्यक्रमों में उचित स्थान देना चाहिए। उनके नाम पर शोध संस्थान, स्मारक और सामाजिक अध्ययन केंद्र स्थापित किए जाने चाहिए। साथ ही बंजारा, विमुक्त, घुमंतू एवं अतिपिछड़े समुदायों के राजनीतिक, शैक्षिक और आर्थिक प्रतिनिधित्व पर गंभीर नीति बननी चाहिए।

किसी महापुरुष को याद करना अच्छी बात है, लेकिन उस महापुरुष के समाज को राजनीतिक रूप से हाशिए पर रखकर केवल उसका नाम लेना सम्मान नहीं, विरोधाभास है।

बंजारा समाज यदि आज अपने राजनीतिक संगठन, अपने चुनाव चिह्न और अतिपिछड़े-अतिदलित समाज के व्यापक गठबंधन की बात कर रहा है तो मुख्यधारा के दलों को इसे चेतावनी की तरह नहीं, लोकतंत्र के स्वाभाविक विकास के रूप में देखना चाहिए।

क्योंकि राजनीति का नया सवाल बहुत सीधा है—

“बाबा लक्खी शाह बंजारा को नमन करते हो तो उनके समाज को सत्ता में हिस्सेदारी भी दो।”

और यदि राजनीतिक दल हिस्सेदारी नहीं देंगे, तो लोकतंत्र में प्रत्येक समाज को अपना नेतृत्व खड़ा करने, अपना संगठन बनाने और अपने वोट की ताकत से सत्ता का दरवाजा खोलने का पूरा अधिकार है।

अब सम्मान केवल फूल-मालाओं से नहीं मापा जाएगा।

सम्मान की असली कसौटी होगीविधानसभा में कितने, संसद में कितने और सरकार में कितने।

      विनेश ठाकुर ‘कर्पूरी’

मुख्य सम्पादक, विधान केसरी, लखनऊ

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