लखनऊ। राजधानी में जरा सी बारिश क्या हुई, नगर निगम के दावों की पोल परत-दर-परत खुलकर सामने आ गई। वैसे तो शहर में बारिश के बाद सड़कों का समंदर बन जाना कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार व्यवस्था का यह तमाशा सीधे श्सिस्टमश् के मुहाने पर ही देखने को मिला। जिस नगर निगम पर पूरे शहर की जलनिकासी और नाला सफाई का दारोमदार है, उसी नगर निगम कार्यालय के मुख्य द्वार पर जलभराव का साम्राज्य कायम हो गया।
शहर भर की नालियों की सिल्ट निकालने और जलजमाव दूर करने का दावा करने वाले अधिकारियों को शायद अंदाजा भी नहीं था कि पानी उनकी अपनी ही चैखट पर दस्तक दे देगा। जो कार्यालय हर दिन दर्जनों फाइलों पर शहर को चमकाने और ड्रेनेज सिस्टम सुधारने की योजनाएं बनाता है, उसके दरवाजे पर जमा यह पानी चीख-चीखकर जमीनी हकीकत का लाइव डेमो दे रहा है।
जब विभाग का अपना परिसर ही पानी में डूबने से नहीं बच सका, तो शहर की तंग गलियों और वीआईपी इलाकों से दूर बसे मोहल्लावासियों की स्थिति क्या होगी, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।
अगर थोड़े व्यंग्य के साथ देखें, तो हो सकता है कि नगर निगम प्रशासन ने शहरवासियों से सहानुभूति जताने का यह अनूठा तरीका खोज निकाला हो! शायद विचार यह रहा होगा कि जब पूरी जनता जलभराव की मुसीबतें झेल रही है, तो अधिकारियों को भी एसी दफ्तरों में बैठकर श्वॉटर-पार्कश् जैसा अनुभव लेने का पूरा हक है। ताकि वे समझ सकें कि आम जनता हर मानसून में किन दुश्वारियों से गुजरती है।
हर साल मानसून आने से पहले बैठकों का दौर चलता है, करोड़ों रुपये के बजट पास होते हैं, नालों के निरीक्षण की तस्वीरें छपती हैं और व्यवस्था दुरुस्त होने के लंबे-चैड़े दावे पेश किए जाते हैं। लेकिन बारिश की पहली ही परीक्षा में नगर निगम का अपना मुख्य द्वार फेल हो जाता है। अब लखनऊ की जनता प्रशासन से सीधे सवाल कर रही है कि जब शहर का ड्रेनेज संभालने वाली संस्था खुद अपने गेट से पानी निकालने में अक्षम है, तो आम गलियों का पानी कितनी सदी में निकलेगा ? नाला सफाई और ड्रेनेज मरम्मत के नाम पर जो बजट कागजों में श्बहायाश् गया, क्या वह इसी जलभराव में बह गया ? क्या अब, जब पानी अधिकारियों की गाड़ियों के पहियों तक पहुंच चुका है, उन्हें शहर की असल समस्या दिखाई देगी या फिर यह भी एक श्सामान्य घटनाश् मानकर भुला दिया जाएगा?
नगर निगम के दरवाजे पर खड़ा यह पानी किसी की दर्ज कराई गई शिकायत नहीं है, बल्कि यह उस पूरे ढर्रे को आईना दिखाने आया है जो हर साल केवल कागजी वादों पर तैरता है। अब देखना यह है कि इस करारे झटके के बाद जिम्मेदार जागते हैं या फिर अगले मानसून में भी कार्यालय के बाहर बोट चलाने की तैयारी करते हैं !
