भांवरकोल/गाजीपुर। सनातन धर्म में गया जी में श्राद्ध और पिंडदान का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बिहार के गया जी में विधि-विधान से पिंडदान करने से पितरों को तृप्ति मिलती है और उनकी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। इसी आस्था के चलते पितृपक्ष में देश-विदेश से श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मिक शांति के लिए गया जी पहुंचते हैं।
गरुड़ पुराण, वायु पुराण, अग्नि पुराण और वराह पुराण में गया तीर्थ की महिमा तथा श्राद्ध-पिंडदान की परंपरा से संबंधित वर्णन मिलते हैं। धार्मिक मान्यता है कि गया जी में पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और उनके लिए स्वर्ग के द्वार खुल जाते हैं। 108 कुलों और सात पीढ़ियों के उद्धार की मान्यता भी गया श्राद्ध के महात्म्य से जुड़ी हुई है।
गया जी में स्थित विष्णुपद मंदिर, फल्गु नदी, अक्षयवट और प्रेतशिला का श्राद्ध-कर्म में विशेष महत्व माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इन पवित्र स्थलों पर श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने से पितरों को अक्षय पुण्य प्राप्त होता है। गया तीर्थ से जुड़ी गयासुर की कथा भी इसकी धार्मिक महत्ता को दर्शाती है।
पितृपक्ष के दौरान श्रद्धालु अपने माता-पिता, दादा-दादी और अन्य पूर्वजों के निमित्त तर्पण एवं पिंडदान कर उनकी शांति और मुक्ति की कामना करते हैं। मान्यता है कि पितरों के प्रति श्रद्धा और विधि-विधान से किए गए श्राद्ध से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है तथा परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है।
गया जी में श्राद्ध और पिंडदान की परंपरा आज भी सनातन संस्कृति में पितरों के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और पारिवारिक दायित्वों का प्रतीक बनी हुई है। यही कारण है कि पितृपक्ष में गया जी में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है।
