घिसटकर चलती हैं 3 बच्चियां, मां-बाप नहीं रहेंगे तो क्या होगा? तीन दिव्यांग बेटियों के साथ बेबस परिवार
September 06, 2026
ओडिशा के क्योंझर जिले के बांसपाल ब्लॉक के घुंघी गांव से सामने आई एक परिवार की कहानी दिल को झकझोर देने वाली है। यहां नटबर जुआंग और उनकी पत्नी कुंद जुआंग अपनी तीन दिव्यांग बेटियों के साथ बेहद मुश्किल हालात में जिंदगी गुजार रहे हैं। जिस उम्र में बच्चों को खेलना, हंसना और अपने भविष्य के सपने देखने चाहिए, उस उम्र में नटबर की बेटियां अपनी दिव्यांगता के कारण घर की चारदीवारी तक सीमित हैं। इनमें कोई ठीक से चल नहीं पाती, तो कोई अपने रोजमर्रा के काम खुद नहीं कर पाती।
नटबर जुआंग के परिवार में कुल छह सदस्य इस समय एक छोटे से घर में रहते हैं। परिवार के पास खेती करने के लिए अपनी जमीन नहीं है और कोई नियमित आमदनी का जरिया भी नहीं है। नटबर और उनकी पत्नी कुंद पहले मजदूरी करके परिवार चलाते थे, लेकिन उम्र बढ़ने के कारण अब उनके लिए मजदूरी करना भी मुश्किल हो गया है। ऐसे में परिवार की रोजमर्रा की जरूरतें सरकारी मदद और मिलने वाले चावल पर काफी हद तक निर्भर हैं।
परिवार आदिवासी जनजाति से जुड़ा हुआ है, जिसके कारण उन्हें सरकार की ओर से 35 किलो चावल मुफ्त मिलता है। परिवार का कहना है कि इसी चावल के सहारे घर का गुजारा चल रहा है। नटबर जुआंग की कुल पांच बेटियां हैं। इनमें से दो बेटियों की शादी हो चुकी है, जबकि तीन बेटियां दिव्यांगता के साथ जीवन जी रही हैं।
दूसरे बच्चे जब बाहर खेलते और दौड़ते हैं, तब ये तीन बहनें उन्हें दूर से देखती हैं। उनकी जिंदगी की मुश्किलें उनके चेहरे पर साफ दिखाई देती हैं। इन बेटियों के लिए घर से बाहर निकलना भी किसी चुनौती से कम नहीं है। पैरों से चलने में असमर्थ होने के कारण उन्हें आने-जाने के लिए जमीन पर घिसटकर या किसी तरह आगे बढ़ना पड़ता है। गांव की कच्ची, ऊबड़-खाबड़ और कीचड़ भरी सड़कें उनकी परेशानी को और बढ़ा देती हैं। ऐसे हालात में स्कूल जाना, इलाज के लिए बाहर जाना या अपनी किसी जरूरी जरूरत के लिए घर से निकलना बेहद मुश्किल हो जाता है।
सरकारी नियमों के अनुसार, दिव्यांग लोगों के लिए पेंशन, घर, चावल और दूसरी सुविधाओं का प्रावधान है। लेकिन नटबर जुआंग के परिवार की स्थिति देखकर सवाल उठता है कि इन योजनाओं का लाभ जरूरत के मुताबिक परिवार तक पहुंच पा रहा है या नहीं।
परिवार के मुताबिक तीन दिव्यांग बेटियों के लिए सरकार की ओर से सिर्फ दो दिव्यांग वाहन मिले हैं। इलाज के लिए करीब 20 हजार रुपये की आर्थिक मदद भी मिली है। लेकिन तीन दिव्यांग बेटियों के लंबे समय तक चलने वाले इलाज और देखभाल के लिए क्या 20 हजार रुपये पर्याप्त हैं? यही चिंता परिवार को लगातार परेशान कर रही है।
घुंघी गांव में जुआंग समुदाय और आदिवासी जनजातियों के विकास के लिए संबंधित विकास संस्थाएं भी काम कर रही हैं। इसके बावजूद नटबर जुआंग का परिवार आज भी बेहद कठिन परिस्थितियों में रह रहा है। परिवार के पास अपना सुरक्षित घर नहीं है। तीन दिव्यांग बेटियों की जरूरतों के मुताबिक पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं और माता-पिता भी उम्र के इस पड़ाव पर नियमित रूप से काम करने की स्थिति में नहीं हैं। एक तरफ तीन बेटियों की देखभाल की जिम्मेदारी है और दूसरी तरफ माता-पिता की अपनी बढ़ती उम्र। ऐसे में परिवार के सामने सबसे बड़ा सवाल बेटियों के भविष्य को लेकर है।
