लखनऊ। नवाबों के शहर में आजकल ट्रैफिक व्यवस्था नवाबों से भी ज्यादा श्शाहीश् मिजाज में नजर आ रही है। सड़क पर जनता घंटों पसीना बहा रही है और एयरकंडीशंड दफ्तरों में बैठे जिम्मेदार अफसरों के पास श्सरकारी नंबरश् उठाने तक की फुरसत नहीं है। सोमवार को फैजाबाद रोड पर लगे किलोमीटर लंबे महाजाम ने एक बार फिर लखनऊ ट्रैफिक पुलिस के दावों और कार्यशैली की कलई खोलकर रख दी है।
तपती धूप और धुएं के गुबार के बीच घंटों गाड़ियां रेंगती रहीं, एम्बुलेंस के सायरन घुटते रहे और जब बेबस जनता व मीडिया ने ट्रैफिक व्यवस्था के सबसे बड़े रहनुमा यानी डीसीपी ट्रैफिक के सरकारी नंबर पर संपर्क साधने की कोशिश की, तो घंटी बजती रहीकृजवाब कोई नहीं मिला।
जब शहर का सबसे व्यस्ततम मार्ग कई किलोमीटर लंबे जाम में तब्दील हो जाए और उस वक्त जिले का सबसे बड़ा ट्रैफिक अधिकारी फोन उठाने का जहमत न उठाए, तो सवाल उठना लाजमी है। यह सरकारी नंबर जनता के टैक्स से इसलिए रिचार्ज नहीं किया जाता कि अधिकारी उस पर श्अनसुनेश् का मोड एक्टिवेट कर लें। आखिर जब संकट के वक्त ही जिम्मेदार साहब फोन नहीं उठाएंगे, तो जनता अपनी गुहार किसके पास लेकर जाए? क्या यह नंबर केवल फाइलों और कागजों में श्उपलब्धताश् दिखाने का एक महज शो-पीस बनकर रह गया है ?
फैजाबाद रोड का मंजर चीख-चीख कर कह रहा है कि जमीन पर श्प्रभावी मौजूदगीश् के नाम पर केवल रस्म अदायगी हो रही है। वीआईपी मूवमेंट में छावनी में तब्दील हो जाने वाली लखनऊ पुलिस आम जनता के जाम में फंसने पर अचानक नदारद हो जाती है। चैराहों पर खड़े सिपाही और होमगार्ड अक्सर ट्रैफिक संभालने के बजाय छांव तलाशते या मोबाइल में व्यस्त नजर आते हैं। जब शीर्ष नेतृत्व ही सुध लेने को तैयार नहीं है, तो मातहतों से मुस्तैदी की उम्मीद भी कैसे की जा सकती है ?
स्मार्ट सिटी का तमगा पहने लखनऊ में हर दिन हजारों लोग सड़क पर घंटों का वक्त गंवा रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर इस प्रशासनिक बेपरवाही और लापरवाही की जवाबदेही किसकी तय होगी? क्या शासन इस बात का संज्ञान लेगा कि जनता की सहूलियत के लिए दिए गए सीयूजी नंबर अफसरों के विश्राम में खलल न डालने के लिए बने हैं या जनता की बात सुनने के लिए?
अगर राजधानी का यह हाल है, तो प्रदेश के बाकी जिलों की तस्वीर का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। अब देखना यह है कि इस श्गंभीर सन्नाटेश् के बाद आलाधिकारी नींद से जागते हैं या जनता ऐसे ही सड़कों पर श्जाम का दंशश् झेलने को मजबूर रहेगी।
