लखनऊ। राजधानी में कागजी विकास का गुब्बारा एक बार फिर पारा इलाके के वादलखेड़ा में फूट गया है। नगर निगम के लंबे-चैड़े दावों और श्स्मार्ट सिटीश् के विज्ञापनों के बीच वादलखेड़ा के निवासी इन दिनों अपनी ही गलियों में श्जल-समाधिश् लेने को मजबूर हैं। महीनों से जलभराव की समस्या झेल रहे स्थानीय लोगों का सब्र आखिरकार का जवाब दे गया और आक्रोशित जनता को अपनी आवाज सुनाने के लिए सड़कों पर उतरकर जोरदार प्रदर्शन करना पड़ा।
हैरानी की बात यह है कि जिस समस्या का समाधान लखनऊ नगर निगम को करना चाहिए था, वहां नाली और जल निकासी दुरुस्त करने के बजाय हालात संभालने के लिए श्पारा थाना पुलिसश् को मैदान में उतारना पड़ा।
स्थानीय निवासियों का साफ आरोप है कि उन्होंने जलभराव की इस विकराल समस्या को लेकर नगर निगम के अधिकारियों से लेकर जनसुनवाई पोर्टल तक शिकायतों का अंबार लगा दिया। लेकिन अफसरशाही का ढर्रा इतना सुस्त है कि जनसमस्याओं को सिर्फ श्फाइलों में निस्तारितश् करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली जाती है। कई बार गुहार लगाने के बाद भी जब नगर निगम के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी, तब जाकर बेबस और नाराज जनता को उग्र प्रदर्शन का रास्ता चुनना पड़ा।
जब वादलखेड़ा में जनता का गुस्सा भड़का और हंगामा बढ़ा, तो जल निकासी की मशीनें भेजने के बजाय मौके पर पारा पुलिस की गाड़ियां दौड़ीं। पुलिसकर्मियों ने जैसे-तैसे समझा-बुझाकर लोगों को शांत कराया और मामला रफा-दफा किया। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या अब लखनऊ नगर निगम का काम भी पुलिस विभाग ही संभालेगा? क्या नगर निगम के जिम्मेदार अधिकारी केवल टैक्स वसूलने के लिए बचे हैं और जनता के हक के बुनियादी काम कराने के लिए खाकी वर्दी को आगे कर दिया जाएगा?
सोशल मीडिया पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और लखनऊ नगर निगम को टैग करते हुए लोग यह पूछने पर मजबूर हैं कि आखिर यह कैसा श्स्मार्टश् लखनऊ है? जहाँ छोटी सी बारिश या जल निकासी न होने से पूरा का पूरा इलाका टापू में तब्दील हो जाता है।
वादलखेड़ा के लोग आज दूषित पानी, बदबू और डेंगू-मलेरिया जैसी बीमारियों के खौफ में जीने को मजबूर हैं। अगर नगर निगम के आलाधिकारी अब भी अपनी कुंभकर्णी नींद से नहीं जागे, तो पुलिस बल के दम पर दबाया गया जनता का यह आक्रोश आने वाले दिनों में और बड़े जन-आंदोलन का रूप ले सकता है।
