लम्भुआ/सुलतानपुर। सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में डॉक्टरों की तैनाती और ड्यूटी को लेकर लम्भुआ क्षेत्र से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि बड़ागांव पीएचसी में तैनात डॉक्टर राम सजीवन लंबे समय से लम्भुआ सीएचसी में बैठकर कार्य कर रहे हैं, जबकि उनकी नियमित तैनाती बड़ागांव पीएचसी में बताई जा रही है। मामला तब और गंभीर हो गया, जब शिकायत के बाद सीएचसी लम्भुआ के अधीक्षक की ओर से उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया गया, लेकिन इसके बावजूद स्थिति में अपेक्षित बदलाव नजर नहीं आया। बताया जा रहा है कि डॉक्टर राम सजीवन की सप्ताह में एक दिन लम्भुआ सीएचसी पर ड्यूटी निर्धारित है, लेकिन आरोप है कि वह निर्धारित दिन के अलावा भी सीएचसी परिसर में मौजूद रहते हैं और यहां मरीजों को देखते हैं। इतना ही नहीं, उनके ऊपर बाहर की दवाएं लिखने के भी आरोप लगाए जा रहे हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि विभागीय जांच का विषय है।
’महीनों के स्टिंग में खड़े हुए कई सवाल’ मामले को लेकर किए गए कथित स्टिंग ऑपरेशन के दौरान जीपीएस लोकेशन, फोटो और वीडियो के माध्यम से डॉक्टर की उपस्थिति को दर्ज किए जाने का दावा किया गया है। आरोप है कि कई मौकों पर डॉक्टर राम सजीवन बड़ागांव पीएचसी के बजाय लम्भुआ सीएचसी में दिखाई दिए।सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि डॉक्टर की तैनाती बड़ागांव पीएचसी में है और लम्भुआ सीएचसी में उनकी नियमित ड्यूटी निर्धारित नहीं है, तो वह लगातार सीएचसी के एक कक्ष में बैठकर कार्य कैसे कर रहे हैं?
’अधीक्षक की मौजूदगी में बैठने का आरोप’ आरोप तो यहां तक है कि डॉक्टर राम सजीवन सीएचसी के प्रथम कक्ष में बैठकर कार्य करते हैं और यह सब सीएचसी अधीक्षक राघवेन्द्र की मौजूदगी में होता है। यदि आरोप सही हैं तो यह सवाल स्वाभाविक है कि अस्पताल परिसर में डॉक्टर की मौजूदगी और कार्यप्रणाली की जानकारी जिम्मेदार अधिकारियों को क्यों नहीं हुई सीएचसी परिसर में जगह-जगह सीसीटीवी कैमरे लगे होने की बात भी सामने आती है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि कैमरों की निगरानी और अस्पताल की दैनिक व्यवस्था देखने वाले जिम्मेदार अधिकारियों की नजर से यह कथित गतिविधियां कैसे बचती रहीं?
मामला जनसुनवाई के माध्यम से अधिकारियों तक पहुंचने के बाद सीएचसी लम्भुआ के अधीक्षक की ओर से डॉक्टर राम सजीवन को कारण बताओ नोटिस जारी किए जाने की बात सामने आई है। नोटिस में उनसे यह स्पष्ट करने को कहा गया कि वह लम्भुआ सीएचसी में किस आधार पर बैठकर कार्य कर रहे हैं। यह कार्रवाई अपने आप में कई सवाल खड़े करती है। यदि अधीक्षक को यह जानकारी नहीं थी कि कौन डॉक्टर किस पीएचसी पर तैनात है और कौन कहां कार्य कर रहा है, तो अस्पताल की प्रशासनिक निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है। और यदि जानकारी थी, तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
स्थानीय सूत्र डॉक्टर राम सजीवन के कथित रूप से प्रभावशाली संपर्कों और पारिवारिक पहचान का हवाला देते हुए विभागीय स्तर पर दबदबे की चर्चाएं कर रहे हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। यही वजह है कि पूरे मामले में निष्पक्ष विभागीय जांच बेहद जरूरी हो जाती है, ताकि यह साफ हो सके कि डॉक्टर की वास्तविक तैनाती क्या है, उनकी निर्धारित ड्यूटी कहां है और वह किन परिस्थितियों में लम्भुआ सीएचसी में कार्य कर रहे हैं।
’बड़ा सवालकृव्यवस्था चल रही है या ‘व्यवस्था’ कराई जा रही है’ सबसे गंभीर सवाल यह है कि यदि डॉक्टर की तैनाती एक स्थान पर है और वह कथित तौर पर दूसरे अस्पताल में लंबे समय तक बैठकर कार्य कर रहे हैं, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है? क्या विभाग के उच्चाधिकारी इससे अनजान हैं?
- क्या सीसीटीवी फुटेज की जांच की गई?
- क्या डॉक्टर की उपस्थिति का बायोमेट्रिक रिकॉर्ड खंगाला गया?
- क्या मरीजों को लिखी गई दवाओं की जांच हुई?
- और यदि बाहर की दवा लिखने के आरोप हैं, तो उसकी भी जांच कराई गई
इन सवालों के जवाब सीएचसी प्रशासन से लेकर सीएमओ कार्यालय तक मांगे जाने चाहिए फिलहाल मामला सिर्फ एक डॉक्टर के अस्पताल में बैठने का नहीं, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की निगरानी, ड्यूटी व्यवस्था और कथित प्रभाव के आगे प्रशासनिक कार्रवाई की स्थिति का बन गया है।अब देखना यह है कि कारण बताओ नोटिस के बाद विभाग केवल कागजी खानापूर्ति तक सीमित रहता है या फिर डॉक्टर की तैनाती, उपस्थिति, सीसीटीवी फुटेज, बायोमेट्रिक रिकॉर्ड और मरीजों को लिखी गई दवाओं की निष्पक्ष जांच कराकर पूरे मामले की सच्चाई सामने लाता है। मामले से जुड़े दस्तावेज, नोटिस और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर इस प्रकरण की अगली कड़ी में और भी तथ्य सामने लाए जाएंगे।
