सराय स्वामी में बैल के साथ मारपीट का मामला, एफआईआर का रिकॉर्ड ही खोल रहा पुलिस की कार्यप्रणाली की पोल, भौकाल और रसूख के आगे बंद हुई पुलिस की बोलती
प्रतापगढ़/बाबागंज। अधिकारियों को गुमराह करने और कार्रवाई से बचने के लिए महेशगंज पुलिस ने जो कहानी गढ़ी, उसी कहानी की पोल अब थाने में दर्ज एफआईआर खोल रही है। सराय स्वामी गांव में बैल के साथ मारपीट के मामले में स्थानीय ग्रामीण की तहरीर को दरकिनार कर पुलिस ने मुकदमा दर्ज नहीं किया, लेकिन जब दिल्ली से कुछ लोग थाने पहुंचे तो उन्हीं की तहरीर पर मुकदमा दर्ज करने में पुलिस ने देर नहीं लगाई। खास बात यह है कि मुकदमे की एफआईआर में ही पुलिस ने यह दर्ज किया है कि शिकायत करने के लिए कोई व्यक्ति तैयार नहीं था, जबकि इससे पहले गांव के ही शिवांश पांडेय पुलिस को नामजद तहरीर देकर कार्रवाई की मांग कर चुके थे। पुलिस का यही विरोधाभास अब उसकी कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
महेशगंज थाना क्षेत्र के सराय स्वामी गांव में कुछ दिन पहले एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। वीडियो में एक व्यक्ति बैल के साथ मारपीट करता दिखाई दे रहा था। वीडियो सामने आने के बाद 20 अगस्त को गांव निवासी शिवांश पांडेय पुत्र राममणि पांडेय ने आरोपी को नामजद करते हुए पुलिस को तहरीर दी और कार्रवाई की मांग की। इसके बावजूद स्थानीय पुलिस ने मुकदमा दर्ज करने के बजाय मामले को टालने का रास्ता अपनाया। आरोप है कि पुलिस आरोपी से मिलकर मामले में लीपापोती करने में जुटी रही। जब सोशल मीडिया के जरिए उच्चाधिकारियों तक शिकायत पहुंची तो पुलिस को कार्रवाई के लिए मजबूर होना पड़ा।
पुलिस ने आरोपी रंजीत पांडेय पुत्र ओम प्रकाश पांडेय का शांतिभंग में चालान कर दिया और अपने बचाव में अधिकारियों को यह बताया कि पूछताछ के दौरान आरोपी पुलिस से आमादा फौजदारी हो गया था। इतना ही नहीं, कार्रवाई को सही साबित करने के लिए स्थानीय पुलिस के मीडिया सेल से सीओ सदर मनोज रघुवंशी का वीडियो भी प्रसारित कराया गया। पुलिस ने अपनी ओर से कार्रवाई का पूरा माहौल तैयार कर दिया, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
23 अगस्त को उस समय पूरा मामला पलट गया, जब दिल्ली से कुछ लोग सराय स्वामी गांव में बैल के साथ हुई मारपीट के मामले में पुलिस की कार्रवाई की जानकारी लेने महेशगंज थाने पहुंच गए। बाहर से आए लोगों को देखकर पुलिस सकते में आ गई और समूह में शामिल सुनील शर्मा पुत्र राधा चरण शर्मा निवासी रोड नागलोई दिल्ली, 60 यादव पार्क एक्सटेंशन, नजफगढ़, निहाल विहार बाहरी जिला दिल्ली की तहरीर पर आरोपी रंजीत पांडेय के खिलाफ बीएनएस की धारा 325 तथा पशुओं के प्रति क्रूरता का निवारण अधिनियम 1960 की धारा 11(1) के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया।
मुकदमा दर्ज कराने वाले सुनील शर्मा ने पुलिस को दी तहरीर में बताया कि उन्हें घटना की जानकारी सोशल मीडिया के माध्यम से हुई। वहीं एफआईआर में पुलिस की ओर से दर्ज किया गया है कि पुलिस ने वादी को बताया कि घटना के संबंध में कोई भी व्यक्ति रिपोर्ट दर्ज कराने को तैयार नहीं है। यहीं से पुलिस की कार्रवाई पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। जब स्थानीय युवक शिवांश पांडेय 20 अगस्त को ही नामजद तहरीर देकर कार्रवाई की मांग कर चुका था, तो पुलिस ने किस आधार पर यह लिख दिया कि कोई शिकायतकर्ता रिपोर्ट दर्ज कराने को तैयार नहीं था?
एक तरफ स्थानीय युवक की तहरीर को पुलिस ने नजरअंदाज किया और दूसरी तरफ दिल्ली से आए व्यक्ति की तहरीर मिलते ही मुकदमा दर्ज कर दिया। इससे पुलिस की कार्रवाई को लेकर उठ रहे सवाल और गहरे हो गए हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस बात को छिपाने के लिए पुलिस तर्क दे रही थी, वही बात अब थाने की एफआईआर में दर्ज होकर सामने आ गई है। एफआईआर के छह बिंदुओं में पुलिस ने वादी से बातचीत का विवरण दर्ज किया है और यह भी उल्लेख किया है कि वादी ने विवेचना के दौरान संबंधित रिकॉर्ड विवेचक को उपलब्ध कराने की बात कही है।
अब सवाल यह है कि यदि स्थानीय स्तर पर शिवांश पांडेय ने तहरीर देकर कार्यवाही की मांग की और पुलिस को कार्रवाई करनी ही थी तो स्थानीय शिकायतकर्ता की तहरीर पर मुकदमा क्यों नहीं दर्ज किया गया? और यदि दिल्ली से आए व्यक्ति की तहरीर पर मुकदमा दर्ज करना कानूनन संभव था तो उसी कार्रवाई को पहले स्थानीय शिकायतकर्ता की तहरीर पर क्यों नहीं किया गया? चर्चा है कि मुकदमा दर्ज करके पुलिस ने ये संदेश दिया है कि मुकदमा दर्ज कराने के लिए भी रसूख और पहुँच का होना भी जरूरी है। यह मुकदमा भी किसी उच्चाधिकारी के आदेश नही दर्ज हुआ है खुद एसओ संदीप त्रिपाठी के आदेश पर ही दर्ज हुआ है जो पहले मुकदमा नही लिखें थें।
महेशगंज पुलिस की कार्यप्रणाली का यह विरोधाभास अब उसी की एफआईआर से उजागर हो रहा है। पुलिस पहले कार्रवाई का श्रेय लेने के लिए वीडियो प्रसारित कराती रही, लेकिन जब बाहर से लोग कार्रवाई का हिसाब मांगने थाने पहुंच गए तो मुकदमा भी दर्ज करना पड़ा। नतीजा यह हुआ कि पुलिस जिस मामले को अपने तर्कों और प्रभाव के सहारे दबाने में जुटी थी, उसी मामले में दर्ज एफआईआर अब पुलिस के दावों की पोल खोल रही है। मामला सामने आने के बाद महेशगंज पुलिस की कार्यशैली को लेकर इलाके में तरह-तरह के सवाल उठ रहे हैं और पुलिस की खूब किरकिरी हो रही है।
